आगरा नगर निगम में ‘सदन संग्राम’: मेयर vs अफसरशाही के हाई-वोल्टेज टकराव के बाद क्या महापौर खुद के बनाए जाल में फंस गई हैं?

आगरा। नगर निगम के सदन में 23 मार्च को जो कुछ हुआ, उसने शहर की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। नगर आयुक्त को निशाने पर लेते हुए निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया गया, लेकिन पूरे घटनाक्रम की तह में जाएं तो मामला सिर्फ अफसरशाही बनाम जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि रणनीतिक चूक और सत्ता संघर्ष का भी नजर आता है। मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह अब इस निंदा प्रस्ताव को लेकर मुख्यमंत्री से मिलने की बात कह रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह लड़ाई सच में अफसरशाही के खिलाफ है या खुद की बनाई परिस्थिति में उलझने का परिणाम?

Mar 24, 2026 - 14:07
Mar 24, 2026 - 14:08
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आगरा नगर निगम में ‘सदन संग्राम’: मेयर vs अफसरशाही के हाई-वोल्टेज टकराव के बाद क्या महापौर खुद के बनाए जाल में फंस गई हैं?
शिल्पग्राम की जमीन पर बन रहे यूनिटी मॊल का निरीक्षण कर बाहर आते मंडलायुक्त नगेंद्र प्रताप।

पत्र की चुप्पी न साधी होती तो विवाद पैदा ही न होता

पूरे विवाद की शुरुआत 9 मार्च से होती है, जब मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह ने नगर आयुक्त को सदन की बैठक बुलाने के लिए पत्र लिखा। इसके जवाब में 13 मार्च 2026 को नगर आयुक्त ने वर्ष 2022 के शासनादेश का हवाला देते हुए कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा।

नगर आयुक्त का साफ कहना था कि जब लोकसभा या विधानसभा सत्र चल रहा हो, तब नगर निगम सदन की बैठक नहीं बुलाई जानी चाहिए, क्योंकि सांसद और विधायक भी इसके सदस्य होते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि सत्र के दौरान बैठक तभी संभव है, जब सदन तीन दिन के लिए स्थगित हो।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यहीं खड़ा होता है- नगर आयुक्त के 13 मार्च के इस पत्र का जवाब 23 मार्च तक मेयर कार्यालय की ओर से क्यों नहीं दिया गया?

एजेंडा नहीं, फिर भी बैठक हुई तो किसके निर्देश पर?

नगर आयुक्त द्वारा स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद नगर निगम सचिवालय ने बैठक का एजेंडा जारी नहीं किया। इसके बावजूद मेयर कार्यालय की ओर से पार्षदों को फोन कर-करके 23 मार्च की बैठक में आने के लिए कहा गया।

परिणाम यह हुआ कि पार्षद तो पहुंचे, लेकिन अधिकारी पूरी तरह नदारद रहे। सदन में मेयर अकेली डायस पर बैठीं और इसी के साथ हालात हंगामे में तब्दील होते चले गए। पार्षदों ने हंगामा किया और अंततः नगर आयुक्त के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास कर बैठक समाप्त कर दी गई।

अंदरखाने की रणनीति या राजनीतिक दांव?

सूत्रों की मानें तो 13 मार्च के पत्र के जरिए नगर आयुक्त ने पूरी जिम्मेदारी मेयर के पाले में डाल दी थी। यदि मेयर उस पत्र का लिखित जवाब देतीं और फिर भी बैठक बुलातीं, तो शासनादेश के उल्लंघन की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर आती।

ऐसे में माना जा रहा है कि मेयर ने जानबूझकर पत्र का जवाब नहीं दिया और बैठक बुलाने पर अड़ी रहीं, ताकि विवाद की स्थिति में अफसरशाही को कटघरे में खड़ा किया जा सके। लेकिन यह दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है, क्योंकि अब सवाल मेयर की कार्यशैली और निर्णय क्षमता पर ही उठ रहे हैं।

विधानसभा कमेटी का दौरा भी बना कारण

इस पूरे घटनाक्रम में एक और अहम पहलू सामने आया- विधानसभा की एक कमेटी का आगरा दौरा, जिसमें जिले के सभी वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी अनिवार्य थी। नगर आयुक्त ने इस कमेटी के दौरे की जानकारी भी मेयर को दी और 23 मार्च की बैठक को लेकर स्थिति स्पष्ट करने का आग्रह किया, लेकिन मेयर ने इस पर चुप्पी साध ली। ऐसे में नगर निगम सचिवालय से बैठक का एजेंडा भी जारी नहीं हो सका। सदन की बैठक की वैधानिकता ही सवालों के घेर में आ गई तो नगर निगम अधिकारियों का सदन की बैठक से दूरी बनाना मजबूरी भी था।

राजनीतिक टकराव या प्रशासनिक असंतुलन?

अब मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह मुख्यमंत्री से मिलने की बात कह रही हैं, लेकिन पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि नगर निगम में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच टकराव चरम पर है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि  क्या यह मामला अफसरशाही की मनमानी का है? या फिर मेयर की रणनीतिक चूक का नतीजा?

फिलहाल, आगरा नगर निगम का यह विवाद सत्ता और प्रशासन के टकराव का बड़ा उदाहरण बन चुका है, जिसमें जिम्मेदारी तय होना अभी बाकी है।

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SP_Singh AURGURU Editor