सर्वखाप का तीन दिनी महासत्र: मुजफ्फरनगर के शोरम में जुटी इतिहास, परंपरा और पंचायत की शक्ति
तीन दिन, हजारों लोग, सौ साल पुरानी विरासत और आधुनिक राजनीति का संगम। मुजफ्फरनगर के शोरम गांव में सर्वखाप पंचायत का तीन दिन का विशेष महासत्र मंगलवार को समाप्त हो गया। इस दौरान यहां शासन और समाज का अनूठा उमंगपूर्ण संगम देखने को मिला। जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र सिंह की मौजूदगी ने इस आयोजन को और भी विशेष बना दिया।

सर्वखाप पंचायत के महासत्र के दौरान मौजूद पंचों की एक झलक।
मुजफ्फरनगर। सदियों पुरानी खाप प्रणाली का जीवंत प्रतीक, सर्वखाप पंचायत, मुजफ्फरनगर के शोरम गांव मुख्यालय में 16 से 18 नवंबर तक आयोजित हुई। तीन दिन का यह विशेष सत्र एक बार फिर इतिहास के पन्नों को वर्तमान से जोड़ने में कामयाब रहा।
आयोजन के पहले दिन जम्मू और कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र सिंह ने विशेष अतिथि के रूप में शिरकत की। उनका स्वागत पारंपरिक ढंग से किया गया। पूरे गांव से लेकर आयोजन स्थल तक रंगों, रौनक और खाप प्रतिनिधियों के पहुंचने से माहौल उत्सवी बना रहा।
खाप की परंपरा और टिकैत की ताजपोशी
इस महासत्र में सिसौली गांव के टिकैत को औपचारिक रूप से बलियान खाप का मुखिया घोषित किया गया। 'टिकैत' उपाधि की उत्पत्ति सिसौली परिवार के मुखिया के माथे पर परंपरागत 'टीका' लगाए जाने की रस्म से जुड़ी हुई मानी जाती है।
खाप की सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, सर्वखाप मुख्यालय का सचिव सदैव शोरम गांव का निवासी होता है।
युगों पुराना भवन, विरासत का खजाना
शोरम स्थित सर्वखाप भवन मात्र एक ढांचा नहीं, बल्कि इतिहास का जीवंत गवाह है। करीब 200 साल पुरानी इस इमारत का निर्माण लखौरी ईंट और चूने से किया गया है। इस भवन में रखे लकड़ी के 20 से अधिक बक्सों में सर्वखाप की पुरानी बैठकों और फैसलों का समृद्ध अभिलेख भंडार सुरक्षित है। ये अभिलेख फ़ारसी, उर्दू, अंग्रेज़ी और हिंदी में हैं।
गतिविधियों में उमड़ा सामाजिक उत्साह
सत्र के दौरान पूरे गांव में संगठित तरीके से भंडारे लगाए गए। सड़कों और चौपालों पर खाप के सदस्य और ग्रामीण एकजुट होकर विविध व्यंजनों से अतिथियों का स्वागत करते दिखे। यह आयोजन न केवल परंपरा की मजबूती, बल्कि सामाजिक समरसता और आपसी तालमेल को भी दर्शाता है।
इतिहास के पन्नों से आज तक
पूर्व में विभिन्न जातियों एवं शाखाओं के सरपंच और खाप प्रमुख, यही सब चौपालों में बैठकर सामाजिक विवादों और जटिल मुद्दों का समाधान करते थे। मुजफ्फरनगर में आज भी यह परंपरा सामूहिक सामाजिक न्याय और नेतृत्व की धरोहर के रूप में जीवित है।