आगरा में खंदौली के नेकपुर गांव में मंदिर निर्माण स्थल पर सांपों का बसेरा, सात सांपों का दहशत के बीच किया गया सफल रेस्क्यू
आगरा। आगरा जिले के खंदौली ब्लॉक अंतर्गत नेकपुर गांव में उस समय अफरा-तफरी मच गई जब मंदिर निर्माण स्थल पर रखे ईंटों के ढेर के अंदर बड़े-बड़े सांप देखे गए। ग्रामीणों में डर का माहौल बन गया, लेकिन सूझबूझ और समय पर सूचना देने से एक बड़ा हादसा टल गया। वाइल्डलाइफ एसओएस की रैपिड रिस्पांस यूनिट ने मौके पर पहुंचकर सात रैट स्नेक (ओरिएंटल रैट स्नेक) को सुरक्षित रेस्क्यू किया।
ग्रामीणों के अनुसार, मंदिर निर्माण कार्य के दौरान मजदूरों ने ईंटों के ढेर में हलचल देखी। पास जाकर देखने पर सांप नजर आए, जिसके बाद ग्रामीणों में भय फैल गया। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए ग्रामीणों ने तुरंत वाइल्डलाइफ एसओएस की इमरजेंसी हेल्पलाइन (+91 9917109666) पर संपर्क किया और सहायता मांगी।
सूचना मिलते ही वाइल्डलाइफ एसओएस की दो सदस्यीय प्रशिक्षित बचाव टीम मौके पर पहुंची और पूरी सावधानी के साथ रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। टीम ने एक-एक कर सभी सातों रैट स्नेक को सुरक्षित बाहर निकाला। इस दौरान न तो किसी ग्रामीण को कोई नुकसान हुआ और न ही किसी सांप को चोट आई। रेस्क्यू के बाद सभी सांपों को चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया और स्वस्थ पाए जाने पर उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित छोड़ दिया गया।
वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक एवं सीईओ कार्तिक सत्यनारायण ने कहा कि तेजी से हो रहे शहरीकरण और निर्माण गतिविधियों के कारण मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं। नेकपुर गांव के लोगों ने सह-अस्तित्व का रास्ता चुनते हुए समय पर विशेषज्ञों से मदद ली, जो सराहनीय है। इससे न केवल लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई बल्कि सांपों की जान भी बचाई जा सकी।
वहीं वाइल्डलाइफ एसओएस के डायरेक्टर कंजरवेशन प्रोजेक्ट्स बैजूराज एम.वी. ने बताया कि भारतीय रैट स्नेक पारिस्थितिकी तंत्र में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। ये चूहों की संख्या को नियंत्रित कर संतुलन बनाए रखते हैं। दुर्भाग्यवश, इन्हें अक्सर जहरीला समझकर मार दिया जाता है। ऐसे बचाव अभियान लोगों में जागरूकता बढ़ाने और संघर्ष की स्थितियों को कम करने में मदद करते हैं।
गौरतलब है कि रैट स्नेक एक गैर-विषैला सांप होता है, जो शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में पाया जाता है। ये चूहे, मेंढक, छिपकली, छोटे पक्षी और अंडे खाते हैं। शिकार की कमी होने पर ये मानव बस्तियों की ओर आ जाते हैं। कोबरा से मिलती-जुलती बनावट के कारण लोग इन्हें अक्सर विषैला समझ लेते हैं, जिससे भय और हिंसा की स्थिति बन जाती है।