20 अप्रैल को जन्म जयंती पर विशेषः आशु नाट्य क्रांति के शिल्पी और रंगमंच को जनजागरण का सशक्त माध्यम बनाने वाले युगदृष्टा थे राजेंद्र रघुवंशी

नाट्य पितामह राजेंद्र रघुवंशी ने रंगमंच को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और परिवर्तन का माध्यम बनाया। आशु नाटकों के माध्यम से उन्होंने जनसमस्याओं को मंच पर उतारकर समाज और शासन को आईना दिखाया। आज 20 अप्रैल 2026 को उनकी 106वीं जन्म जयंती है।

Apr 20, 2026 - 12:37
Apr 20, 2026 - 13:24
 0
20 अप्रैल को जन्म जयंती पर विशेषः आशु नाट्य क्रांति के शिल्पी और रंगमंच को जनजागरण का सशक्त माध्यम बनाने वाले युगदृष्टा थे राजेंद्र रघुवंशी
स्व. राजेंद्र रघुवंशी, जिनकी आज 106वीं जन्म जयंती है।

-आदर्श नंदन गुप्ता-

 हिंदी रंगमंच के इतिहास में राजेंद्र रघुवंशी का नाम अत्यंत सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है। उन्हें आशु नाटकों का प्रवर्तक माना जाता है, जिन्होंने रंगमंच को सीधे जनजीवन से जोड़ते हुए सामाजिक चेतना का प्रभावी माध्यम बनाया।

राजेंद्र रघुवंशी ने अपनी टीम के साथ ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को समझकर तत्काल नाटकों का मंचन किया। उनके ये आशु नाटक केवल प्रस्तुति भर नहीं होते थे, बल्कि जनजागरण और प्रशासन को सचेत करने का सशक्त माध्यम बनते थे।

नाटक ढ़ोल की पोल में दिलीप रघुवंशी, राजेन्द्र रघुवंशी और श्रुति जैनः फाइल फोटो

साहित्य सृजन के क्षेत्र में भी उनका योगदान बहुआयामी रहा। वर्ष 1940 से लेखन की शुरुआत करने वाले रघुवंशी ने उपन्यास, नाटक, कहानी, कविता, गीत, ग़ज़ल और रिपोर्ताज जैसी विविध विधाओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उनके उपन्यास कड़वे घूंट’ और बिंध गया सो मोती’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

आपने 10 पूर्णकालिक नाटक और लगभग 80 एकांकी नाटकों की रचना की। विशेष बात यह रही कि वे पहले नाट्य लेखक थे जिन्होंने मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास- गोदान, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि और उनकी कई कहानियों का सफल नाट्य रूपांतरण किया। इसके अलावा अमृतलाल नागर, कृष्ण चंदर, अमृता प्रीतम और उदयशंकर भट्ट जैसे साहित्यकारों की कृतियों को भी मंच पर जीवंत किया।

रघुवंशी जी के निर्देशन में 100 से अधिक मंचीय गीतों और नृत्य-नाटिकाओं की प्रस्तुतियां हुईं। अभिनय, निर्देशन, लेखन, संगीत और मंच संचालन, हर क्षेत्र में उनकी प्रतिभा समान रूप से चमकी।

फिल्म जगत में भी उन्होंने अपनी पहचान छोड़ी। गर्म हवा और जमुना किनारे जैसी फिल्मों में अभिनय किया तथा सारा आकाश में संगीत सहयोग दिया।

1994 में पटना में आयोजित इप्टा के स्वर्ण जयंती समारोह में बाएं से कैफ़ी आज़मी, एके हंगल, अंजन श्रीवास्तव और राजेन्द्र रघुवंशी। फाइल फोटो।

रंगमंच को समर्पित जीवन

20 अप्रैल 1920 को आगरा के मदन मोहन दरवाजा (नूरी गेट के निकट) में जन्मे राजेंद्र रघुवंशी का जीवन रंगमंच के लिए पूर्णतः समर्पित रहा। 26 फरवरी 2003 को 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके कार्य आज भी रंगकर्मियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।

शोध और मान्यता

उनके योगदान पर वर्ष 2002 में कवयित्री रोली तिवारी ने रंगकर्मी राजेंद्र रघुवंशी का लोक रंगमंच में योगदान’ विषय पर डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय से शोध कार्य किया, जो उनकी रचनात्मक विरासत का प्रमाण है।

इप्टा का स्वर्णकाल

वर्ष 1943 में इप्टा की स्थापना से लेकर जीवन पर्यंत राजेंद्र रघुवंशी इससे जुड़े रहे। उनके नेतृत्व में इप्टा का केंद्रीय कार्यालय आगरा में रहा और उस दौर को संगठन का ‘स्वर्णकाल’ माना गया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यसेवी हैं।)

SP_Singh AURGURU Editor