मोहम्मद रफी की पुण्यतिथि पर विशेषः जब वृंदावन की कुंज गली में थम गयी शम्मी कपूर की आवाज

31 जुलाई 1980 को वृंदावन में शम्मी कपूर को अपने गुरु के आश्रम से लौटते समय यह खबर मिली थी कि उनके मित्र और महान गायक मोहम्मद रफी का निधन हो गया है। इस खबर से शम्मी कपूर भावुक हो गए थे।

Jul 31, 2025 - 22:54
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मोहम्मद रफी की पुण्यतिथि पर विशेषः जब वृंदावन की कुंज गली में थम गयी शम्मी कपूर की आवाज


-चंद्र प्रताप सिंह सिकरवार-

वृंदावन। आज से ठीक 45 साल पहले 31 जुलाई 1980 का दिन था। उस दिन मशहूर अभिनेता शम्मी कपूर वृंदावन में ब्रह्मकुंड के पास एक कुंज गली से रिक्शे में बैठकर अपने गुरू जी के आश्रम से लौट रहे थे। रिक्शे में उनके साथ पत्नी भी बैठी थीं। इस बीच पीछे से एक युवक दौड़ता हुआ आया और रिक्शा रुकवाने लगा। रिक्शा रुकवाकर वह कहने लगा- “शम्मी कपूर जी, आज आपकी आवाज चली गयी।”
शम्मी कपूर ने अपने गले पर हाथ फेरते हुए कहा- “मेरी आवाज तो ठीक है। मैंने तो कल रात को ही गुरूजी के सामने आश्रम में भजन सुनाए थे।”
इस बात को फिर उस युवक ने दोहराया और कहा- “नहीं, आपकी आवाज यानी अमर गायक मोहम्मद रफी साहब का मुंबई में निधन हो गया है।”

यह सुनकर शम्मी कपूर रिक्शे से उतरे और थोड़ी देर तक निःशब्द हो गये। उनकी आंखों में आंसू आ गये। वह रोने लगे।
शम्मी कपूर कुंज गली से सीधे अपने गुरू जी के पास पहुंचे, जहां से वह सामान का बैग लेकर दिल्ली होते हुए मुंबई निकल गए।

दरअसल, शम्मी कपूर 27 जुलाई 1980 को गुरू पूर्णिमा वाले दिन वृंदावन अपने गुरू जी के आश्रम में आए थे। चार दिन वृंदावन में ही रुके। उनके जो गुरू जी थे, वह पहाड़ पर रहते थे, लेकिन गुरू पूर्णिमा वाले दिन भक्तों से मिलने हर वर्ष की तरह वृंदावन आये थे। चौथे दिन उन्हें अपने मित्र मोहम्मद रफी के इंतकाल की खबर वृंदावन में ही मिली।

आज के दिन 31 जुलाई 1980 को रफी के जनाजे में उनके लाखों प्रशंसक बरसात में भीगते हुए कब्रिस्तान तक पहुंचे थे।

शम्मी कपूर उन महाराज जी के कहने पर अध्यात्म में डूबने लगे थे। लंबा तिलक लगाते थे। रुद्राक्ष की बड़ी माला पहनते थे। कई अंगूठियां पहनते थे। उनका अक्सर वृंदावन आना-जाना बना रहता था।

गुजरे जमाने के कलाकार शम्मी कपूर के फिल्मी परदे पर गाये ज्यादातर गाने रफी की आवाज में थे। गीत गाते समय उनका अभिनय, लटके-झटके, हाव-भाव एकदम निराले होते थे। यही वजह है कि गीत बेहद लोकप्रिय हुए और स्वयं वह फिल्म जगत में शिखर पर जा पहुंचे।
उनका परदे पर गाया मौहम्मद रफी की आवाज में गीत- “चाहे मुझे जंगली कहो”, “याहू..” को लोग आज भी गुनगुनाते हैं।

रफी ने हिन्दी, पंजाबी, बंगाली, उड़िया, तमिल, तेलगू आदि 14 भारतीय भाषाओं में और 4 विदेशी भाषाओं में सहित कुल 7,516 गीत गाये। गैर‑हिंदी फिल्मी गीत लगभग 112 और गैर‑फिल्मी गीत 328 गाये।

रफी साहब ने हमारे सभी देवता व इष्टों के भजनों को बहुत सुंदर तरीके से गाया। उन भजनों को सुबह-सुबह हम सुनते हैं और मंदिरों में उन भजनों से भगवान की प्रार्थना होती है।

SP_Singh AURGURU Editor