श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: धर्म, प्रेम और करुणा का दिव्य संदेश
कृष्ण की लीलाओं की मधुरता से दैवीय प्रेम का अमृत प्रवाहित होता है। माखनचोर की बाल लीलाओं से आनंद और उल्लास का संचार होता है। बंसी की मधुर तान हर हृदय को आध्यात्मिक समरसता से भर देती है। जन्माष्टमी का यह पावन पर्व हमें एकता और करुणा के मार्ग पर चलने का संकल्प कराता है।
मथुरा की पावन धरा पर जब अधर्म बढ़ा, तब धर्म की स्थापना हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया। उनका जन्मोत्सव केवल ब्रज ही नहीं बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए आशा, प्रेम और करुणा का संदेश है। यह अवसर हमें गीता के उपदेशों को स्मरण कर जीवन में धर्म, सत्य और न्याय की स्थापना करने की प्रेरणा देता है। राधा-कृष्ण की लीलाओं की मधुरता से भक्ति का अमृत प्रवाहित होता है। माखनचोर की बाल लीलाओं से आनंद और उमंग का संचार होता है, बंसी की तान हर हृदय को दिव्यता से भर देती है और जन्माष्टमी का यह पावन पर्व हमें सद्भाव, एकता और मानव कल्याण के मार्ग पर चलने का संकल्प कराता है। प्रस्तुत हैं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर कुछ पंक्तियां-
अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश ये श्री कृष्ण जन्मोत्सव,
मथुरा की भूमि पर आज से शुरु हुआ ये प्रेम, भक्ति का उत्सव।
माखनचोर बना गोपियों के जीवन का आनंद,
गीता उपदेश से उसने मानवता का किया प्रबोधन।
राधा-कृष्ण की लीला से ब्रज हुआ आलोकित,
हर हृदय में गूँजा बांसुरी का मधुर संगीत।
आओ मिलकर मनाएं कृष्ण जन्म का यह पावन महोत्सव,
सद्भाव, प्रेम और धर्म का आज घर-घर मनाएं उत्सव।
-मोहिनी कृष्ण दासी,
गीता/भागवत प्रवक्ता, वृंदावन।