डॉलर के सिंहासन की रक्षा में महाशक्ति का हस्तक्षेप: संप्रभुता, वर्चस्व और बदलती वैश्विक राजनीति का सच
अमेरिका की वैश्विक नीतियां लोकतंत्र से अधिक शक्ति और डॉलर के प्रभुत्व से संचालित हैं। वेनेज़ुएला प्रकरण महज एक देश का मामला नहीं, बल्कि अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों की प्रतिक्रिया है। चीन, रूस और उभरती बहुध्रुवीय व्यवस्था डॉलर-आधारित वर्चस्व को चुनौती दे रही है। भारत सहित कई देशों के लिए यह संकेत है कि संप्रभुता, शक्ति और वैश्विक राजनीति के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।
-पूरन डावर- विचारक एवं विश्लेषक
संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी सहित अपहृत करने के लिए सैन्य अभियान चलाए जाने की खबर ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। हालांकि, मैं इससे तनिक भी आश्चर्यचकित नहीं हूं।
अधिकांश लोग इसे किसी देश की संप्रभुता पर हमला मान रहे हैं। निस्संदेह यह चौंकाने वाला प्रतीत होता है कि जो राष्ट्र स्वयं को लोकतंत्र का सबसे बड़ा पक्षधर बताता है और जिसकी स्वतंत्रता की घोषणा में यह संकल्प निहित था कि जब तक दुनिया का एक भी देश अत्याचार में रहेगा, उसकी अपनी आज़ादी अधूरी रहेगी, वही राष्ट्र किसी अन्य देश की संप्रभुता का उल्लंघन करने वाला ऐसा कदम उठा सकता है।
इसे समझने के लिए यह स्वीकार करना होगा कि अमेरिका यह संकल्प तभी तक निभा सकता है, जब तक वह निर्विवाद महाशक्ति बना रहे। शक्ति ही क्षमता का निर्माण करती है। विडंबना यह है कि अमेरिका की आंतरिक परिस्थितियां, मानवाधिकारों पर अत्यधिक जोर, अतिवादी लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता और मुक्त चिंतन, अब उसी के मूल संकल्प के लिए चुनौती बनती जा रही हैं। कई छोटे देश, जिनमें से अनेक अमेरिकी तकनीकी और आर्थिक सहयोग से बने या टिके, अब उसे चुनौती देने लगे हैं। मादुरो ने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए खुले तौर पर अमेरिका को उकसाया और बार-बार उसे कार्रवाई की चुनौती दी।
ऐतिहासिक रूप से पूरे लैटिन और दक्षिण अमेरिका को उत्तर अमेरिका का ‘पिछवाड़ा’ माना जाता रहा है। जब कोलंबिया ने अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ने वाली जलधारा के निर्माण का विरोध किया, तो पनामा को एक अलग देश के रूप में गढ़ दिया गया और पनामा नहर, एक अद्भुत इंजीनियरिंग उपलब्धि का निर्माण कर उसे प्रभावी रूप से अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र में रखा गया। मुझे हाल ही में वहां जाने का अवसर भी मिला। अब कल्पना कीजिए कि यदि पनामा अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाए या खुले तौर पर अमेरिका को चुनौती दे तो क्या यह स्वीकार्य हो सकता है?
चीन और रूस अमेरिका के अपने ही प्रभाव क्षेत्र में उसे चुनौती दे रहे हैं। चीन ने वेनेज़ुएला में बड़े पैमाने पर निवेश किया है और युआन में तेल खरीद रहा है। अमेरिका किसी भी परिस्थिति में अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कमजोर नहीं होने देना चाहता, क्योंकि उसकी वैश्विक शक्ति काफी हद तक डॉलर-आधारित व्यापार पर टिकी है। डॉलर उसकी ‘कुबेर समान’ मुद्रा है। इसी के माध्यम से अमेरिका देशों को ऋण देता है, नाटो को वित्तपोषित करता है और संयुक्त राष्ट्र का खर्च उठाता है। यदि डॉलर की शक्ति कमजोर होती है, तो अमेरिका का वैश्विक प्रभाव भी घटेगा।
यही कारण है कि अमेरिका–भारत संबंधों में भी तनाव उभर रहा है। भारत रूस से तेल गैर-डॉलर तंत्र के माध्यम से खरीद रहा है और कई देशों के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते कर रहा है। समय के साथ ऐसे प्रबंध भी डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देते हैं। ब्रिक्स देशों से बढ़ती दूरी के पीछे भी यही चिंता है, क्योंकि डॉलर की भूमिका पर अब सवाल उठने लगे हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका एक बड़ी शक्ति इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक तेल व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। इस आधार पर उसके खाड़ी देशों से समझौते हैं, और बदले में अमेरिका ने उन्हें तेल अन्वेषण, परिशोधन की तकनीक और सुरक्षा गारंटी प्रदान की हुई है।
भारत भी कुछ हद तक इसी तरह की स्थिति का सामना कर रहा है। भारत की निर्णायक सहायता से बना बांग्लादेश आज भारत को चुनौती दे रहा है। श्रीलंका और नेपाल जैसे पड़ोसी देश, जो लंबे समय से भारत की सद्भावना से लाभान्वित रहे हैं, कभी-कभी चीनी प्रभाव में भारत को चुनौती देते दिखाई देते हैं। यदि ऐसी स्थितियां लाल रेखा पार करती हैं, तो भारत भी कठोर कदम उठाने को विवश हो सकता है।
कुल मिलाकर यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि अमेरिकी प्रभुत्व ढलान पर है। अमेरिका अभी अपने शिखर पर नहीं पहुंचा है। भारत भले ही विश्व का आध्यात्मिक या सभ्यतागत नेतृत्वकर्ता (अमूर्त शक्ति) बनकर उभर रहा हो, लेकिन भौतिक और कठोर शक्ति (मूर्त सामर्थ्य) के स्तर पर उस मुकाम तक पहुंचने में अभी समय है।
(लेखक आगरा के प्रमुख उद्यमी और फुटवियर एवं चमड़ा उद्योग विकास परिषद के चेयरमैन हैं।)