राज्यपालों पर टाइमलाइन तय करना असंवैधानिक, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा अपना ही पुराना फैसला

नई दिल्ली। भारत के संवैधानिक ढांचे को गहराई से प्रभावित करने वाले एक ऐतिहासिक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को राज्यपालों और राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समय-सीमा निर्धारित करने वाले अपने ही पुराने फैसले को असंवैधानिक घोषित कर दिया। यह फैसला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा आर्टिकल 143 के तहत पूछे गए 14 संवैधानिक सवालों के जवाब में दिया गया है।

Nov 20, 2025 - 16:37
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राज्यपालों पर टाइमलाइन तय करना असंवैधानिक, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा अपना ही पुराना फैसला
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राष्ट्रपति के 14 प्रश्नों पर संविधान पीठ की राय, ‘डीम्ड असेंट’ को बताया गलत, पर राज्यपालों को बिल अनिश्चितकाल रोकने से भी रोका

नई दिल्ली। भारत के संवैधानिक ढांचे को गहराई से प्रभावित करने वाले एक ऐतिहासिक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को राज्यपालों और राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समय-सीमा निर्धारित करने वाले अपने ही पुराने फैसले को असंवैधानिक घोषित कर दिया। यह फैसला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा आर्टिकल 143 के तहत पूछे गए 14 संवैधानिक सवालों के जवाब में दिया गया है।

सीजेआई बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट कहा कि संवैधानिक न्यायालय राष्ट्रपति और राज्यपाल को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए कोई तय समयसीमा नहीं दे सकते। पीठ ने कहा कि आर्टिकल 200 और 201 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल के निर्णय–अधिकार को न्यायालय सीमित नहीं कर सकता। समय-सीमा तय करना संविधान की मूल संरचना और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विरुद्ध है। इसके साथ ही अदालत ने कहा कि तमिलनाडु मामले में दो जजों की बेंच द्वारा दिया गया निर्णय, जिसमें समय–सीमा और 'डीम्ड असेंट' लागू किया गया था, संविधान के अनुरूप नहीं था।

डीम्ड असेंट’ को ठुकराया,  कहा-यह संविधान के ढांचे के विपरीत

पीठ ने दृढ़ शब्दों में कहा कि अदालत द्वारा किसी विधेयक को ‘डीम्ड असेंट’ यानी स्वतः स्वीकृत मान लेना, राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियों का अतिक्रमण है। यह संविधान के तहत स्वीकृत प्रक्रिया नहीं है। पर राज्यपाल बिल अनिश्चितकाल तक रोक भी नहीं सकते। न्यायिक समीक्षा संभव है। एक संतुलित रुख अपनाते हुए अदालत ने यह भी कहा कि राज्यपाल बिलों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते। उनकी भूमिका सहकारी संघवाद के अनुरूप संवादमूलक होनी चाहिए। राजनीति के बजाय प्रक्रिया का पालन हों। यदि राज्यपाल अनुचित या अत्यधिक देरी करें और कोई कारण न बताएं, तो कोर्ट सीमित स्तर पर हस्तक्षेप कर सकता है और राज्यपाल को निश्चित अवधि में निर्णय लेने का निर्देश दे सकता है। लेकिन कोर्ट विधेयक की मेरिट पर हस्तक्षेप नहीं करेगा।

राज्यपालों का विवेक–अधिकार बरकरार

पीठ ने कहा कि राज्यपाल के पास संविधान के तहत यह विकल्प है कि वह बिल को मंजूरी दें। टिप्पणियों के साथ सदन को वापस भेजें। इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित रखें। इन अधिकारों को अदालत सीमित नहीं कर सकती।

तमिलनाडु के 10 बिलों से उठा विवाद

मामला तब बढ़ा जब जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने तमिलनाडु विधानसभा के 10 बिलों को, जो गवर्नर के पास लंबित थे, “बिना स्वीकृति के ही” स्वीकृत (डीम्ड असेंट) मान लिया था।
साथ ही राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए टाइमलाइन भी तय कर दी थी। इसी पर गंभीर सवाल उठाते हुए राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से संवैधानिक राय मांगी थी।

राष्ट्रपति के 14 प्रश्न

राष्ट्रपति ने पूछा था कि क्या समय-सीमा तय करना न्यायपालिका के अधिकार में आता है? क्या अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट राज्यपालों को बाध्य कर सकता है? बिना संविधान में लिखी समय-सीमा के, क्या न्यायालय इसे बना सकता है? क्या लंबित बिलों पर ‘डीम्ड असेंट’ मानना वैध है? पीठ ने स्पष्ट उत्तर दिया कि “नहीं, यह संविधान की भावना के बाहर है।”

10 दिनों की लंबी सुनवाई के बाद ऐतिहासिक फैसला

संविधान पीठ में शामिल सीजेआई बीआर गवई, जस्टिस सूर्य कांत (अगले CJI), जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एस चांदूरकर ने 10 दिनों तक दलीलें सुनीं और 11 सितंबर को निर्णय सुरक्षित कर लिया था। 20 नवंबर को सुनाया गया फैसला भारतीय संघवाद और राज्यपाल—विधानमंडल संबंधों पर स्पष्ट संवैधानिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।