टाटा ग्रुप, 158 साल के साम्राज्य में चेयरमैन की कुर्सी पर टकराव, चंद्रशेखरन की फिर नियुक्ति पर टाटा संस को आपत्ति
टाटा ग्रुप का 158 साल का साम्राज्य इन दिनों चर्चा में आ गया है। गुरुवार को हुई बोर्ड मीटिंग में दोबारा से चेयरमैन अपॉइंट कर दिया गया है लेकिन टाटा ट्रस्ट ने इस नियुक्ति को गैरकानूनी बता दिया है।
नई दिल्ली। टाटा ग्रुप में टाटा संस के चेयरमैन पद को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। गुरुवार को टाटा संस के बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन को पांच साल के एक और कार्यकाल के लिए एग्जीक्यूटिव चेयरमैन बनाए रखने का फैसला किया है। यह फैसला इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि अगस्त में चंद्रशेखरन ने खुद कहा था कि वे फरवरी 2027 में मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद दोबारा चेयरमैन बनने की पेशकश नहीं करेंगे लेकिन अब कहानी पूरी तरह बदल गई है।
बोर्ड की नामांकन और पारिश्रमिक समिति ने सितंबर में चंद्रशेखरन से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा था। गुरुवार की बोर्ड बैठक में उन्होंने इस अनुरोध को स्वीकार किया और बोर्ड ने बहुमत से उनके पांच साल के नए कार्यकाल को मंजूरी दे दी।
मिली जानकारी के मुताबिक चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर टाटा ट्रस्ट्स और नोएल टाटा की आपत्ति सामने आई है। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है। नोएल टाटा जो टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन और बोर्ड में ट्रस्ट्स के नामित निदेशक हैं, ने चंद्रशेखरन की नियुक्ति के खिलाफ वोट दिया।
टाटा ट्रस्ट्स ने कहा है कि यह प्रस्ताव ‘गैरकानूनी’ और ‘कानूनी रूप से अमान्य’ है। ट्रस्ट्स का तर्क है कि चंद्रशेखरन पहले ही दोबारा नियुक्ति नहीं लेने का फैसला कर चुके थे और ट्रस्ट्स ने उनके फैसले को स्वीकार करते हुए उत्तराधिकारी की तलाश शुरू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी यानी अब विवाद सिर्फ चेयरमैन की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि बोर्ड का यह फैसला आगे शेयरहोल्डर्स और कानूनी स्तर पर किस तरह चुनौती दिया जाता है।
टाटा संस के बोर्ड में गुरुवार को चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर बहुमत से फैसला हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक बोर्ड वोट 4-1 रहा और नोएल टाटा ने इसका विरोध किया। टाटा ट्रस्ट्स और चंद्रशेखरन के बीच मतभेद का एक बड़ा मुद्दा टाटा संस की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग भी है। टाटा ट्रस्ट्स लंबे समय से टाटा संस को निजी और अनलिस्टेड कंपनी बनाए रखने के पक्ष में रहा है लेकिन अब रिजर्व बैंक के फैसले के बाद स्थिति बदल गई है।
रिजर्व बैंक ने हाल ही में टाटा संस की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें कंपनी ने अपने एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन से बाहर निकलने की कोशिश की थी। इसके बाद टाटा संस पर आरबीआई के नियमों के मुताबिक आगे कदम उठाने का दबाव बढ़ गया है। टाटा संस को 2022 में अपर लेयर एनबीएफसी की श्रेणी में रखा गया था। इस श्रेणी के लिए शेयर बाजार में लिस्टिंग से जुड़े सख्त नियम लागू होते हैं।
टाटा संस ने पहले अपने बाहरी कर्ज को चुकाकर और कोर इनवेंस्टमेंट कंपनी के तौर पर अपनी स्थिति बदलने की कोशिश करके लिस्टिंग की जरूरत से बाहर निकलने का रास्ता तलाशा था लेकिन आरबीआई के हालिया फैसले ने उस रास्ते को बंद कर दिया।
गुरुवार की बोर्ड बैठक में एक और बड़ा फैसला हुआ। टाटा संस ने आरबीआई के लागू नियमों के मुताबिक लिस्टिंग की दिशा में कदम बढ़ाने का फैसला किया है। कंपनी ने कहा है कि वह RBI, टाटा ट्रस्ट्स और दूसरे हितधारकों से जरूरी मार्गदर्शन लेगी यानी जिस लिस्टिंग को लेकर टाटा ग्रुप के भीतर लंबे समय से मतभेद चल रहे थे।अब वही मुद्दा टाटा संस के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया है।
चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब टाटा ग्रुप के कई बड़े कारोबार दबाव में हैं. एयर इंडिया के कारोबार में लगातार नुकसान, जगुआर लैंड रोवर में मुश्किलें और साइबर हमले से जुड़ी समस्याएं ग्रुप के सामने बड़ी चुनौतियां हैं. इसके साथ ही RBI का दबाव, टाटा संस की संभावित लिस्टिंग और टाटा ट्रस्ट्स के साथ मतभेद ने ग्रुप के शीर्ष स्तर पर स्थिति को और जटिल बना दिया है.