हिंदी विरोध के बहाने ठाकरे ब्रदर्स की ‘पॉलिटिकल रीयूनियन’, सियासी वजूद की तलाश में एकजुटता

मुंबई। महाराष्ट्र सरकार द्वारा कक्षा एक से पांच तक मराठी और अंग्रेज़ी के साथ हिंदी भाषा को अनिवार्य करने के निर्णय ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। मराठी और अंग्रेजी पहले से अनिवार्य थीं, लेकिन हिंदी को जोड़कर सरकार ने त्रिभाषा फार्मूला लागू किया। इस निर्णय को जहां शिक्षा सुधार की दृष्टि से देखा जा रहा है, वहीं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे को इसमें राजनीतिक अवसर नजर आ गया। उन्होंने इसे हिंदी थोपने की साजिश बताकर विरोध का बिगुल फूंक दिया है।

Jun 27, 2025 - 12:36
 0
हिंदी विरोध के बहाने ठाकरे ब्रदर्स की ‘पॉलिटिकल रीयूनियन’, सियासी वजूद की तलाश में एकजुटता

-त्रिभाषा फार्मूले पर भड़के राज ठाकरे, बनाया सियासत का मंच, पांच जुलाई को विरोध मार्च को उद्धव का समर्थन

राजनीतिक हाशिए पर खड़े हैं राज ठाकरे

पिछले विधानसभा चुनाव में मनसे का खाता तक नहीं खुला था। ऐसे में राज ठाकरे अपनी खोई हुई सियासी जमीन तलाश रहे हैं। एक समय मुंबई की सड़कों पर उत्तर भारतीयों के खिलाफ हुंकार भरने वाले राज, अब हिंदी विरोध के जरिए फिर से उसी पुराने तेवर में लौटने की कोशिश में लगे हैं। आगामी पांच जुलाई को उन्होंने हिंदी के मुद्दे पर विरोध मार्च का ऐलान किया है, जिसे वे जनआंदोलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

उद्धव ठाकरे का अप्रत्याशित समर्थन, सियासी मजबूरी या रणनीति?

राज ठाकरे के इस विरोध मार्च को अप्रत्याशित रूप से शिवसेना (उद्धव गुट) के प्रमुख उद्धव ठाकरे का भी समर्थन मिल गया है। हालिया लोकसभा चुनाव और विधानसभा में करारी हार के बाद उद्धव भी प्रदेश की राजनीति में अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। माना जा रहा है कि दोनों ठाकरे ब्रदर्स के पास अब सीमित विकल्प बचे हैं और उन्हें मजबूरी में ही सही, एकजुट होना पड़ रहा है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बरअक्स क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति

भाजपा नेतृत्व वाली फडणवीस सरकार द्वारा हिंदी को प्रोत्साहित करने की कोशिश को क्षेत्रीय अस्मिता पर खतरा बताया जा रहा है। राज ठाकरे इसे मराठी अस्मिता पर हमले की तरह पेश कर रहे हैं। लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि यह असल में राजनीति में फिर से खड़ा होने की कोशिश है। दोनों भाइयों की एकजुटता ने एक तरह से मराठी बनाम हिंदी की बहस को पुनर्जीवित कर दिया है।

पुराने अंदाज़ में धमकी, पर असर संदिग्ध

राज ठाकरे ने विरोध मार्च में शामिल होने का आह्वान भी धमकी भरे अंदाज में किया है। उन्होंने कहा, उनका भी ध्यान रखा जाएगा, जो इस विरोध मार्च में नहीं आएंगे। यह बयान उनके पुराने आक्रामक अंदाज़ की याद दिलाता है, लेकिन बदलते जनमानस और महाराष्ट्र की बदली राजनीतिक जमीन में इसका असर कितना होगा, यह कहना मुश्किल है।

विरोध की राजनीति में संभावनाओं की तलाश

त्रिभाषा फार्मूले के विरोध के बहाने ठाकरे ब्रदर्स ने एक नई राजनीतिक सक्रियता की शुरुआत की है। हालांकि यह विरोध कितनी जनभावना जुटा पाएगा और क्या यह दोनों नेताओं की राजनीतिक वापसी को सफल बना पाएगा, इसका जवाब भविष्य देगा। फिलहाल यह स्पष्ट है कि हिंदी विरोध की आड़ में एक राजनीतिक मेल-मिलाप की पटकथा तैयार हो चुकी है।

SP_Singh AURGURU Editor