'क्या सचमुच हमारी दुनिया के समानांतर भी है कोई और संसार?' लिट आगरा की परिचर्चा में विज्ञान, अध्यात्म और रहस्यों पर गूंजा गहन विमर्श
लिट आगरा के मंच पर लेखक संजय के. रॉय की पुस्तक 'देयर इज़ ए घोस्ट इन माय रूम: लिविंग विद द सुपरनेचुरल' का विमोचन हुआ। परिचर्चा में विज्ञान, अध्यात्म और अलौकिक अनुभवों के बीच संतुलित संवाद ने श्रोताओं को नई दृष्टि प्रदान की।
आगरा। रहस्य, विज्ञान, अध्यात्म और मानवीय अनुभवों के अनूठे संगम पर आधारित चर्चित पुस्तक 'देयर इज़ ए घोस्ट इन माय रूम: लिविंग विद द सुपरनेचुरल' के विमोचन और परिचर्चा ने शनिवार को आगरा के साहित्यिक जगत को एक अलग ही अनुभव से रूबरू कराया। लिट आगरा संस्था की ओर से संजय प्लेस स्थित होटल फेयरफील्ड बाय मैरियट में आयोजित कार्यक्रम में लेखक एवं प्रख्यात कला-संस्कृति उद्यमी संजय के. रॉय ने स्पष्ट किया कि उनकी पुस्तक भूत-प्रेत या अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली नहीं, बल्कि जीवन में घटित वास्तविक अनुभवों, स्मृतियों और उन रहस्यमयी घटनाओं की संवेदनशील प्रस्तुति है, जिन्हें विज्ञान अब तक पूरी तरह समझ नहीं पाया है। परिचर्चा के दौरान विज्ञान और अध्यात्म के बीच संतुलित संवाद ने उपस्थित साहित्य प्रेमियों को लंबे समय तक बांधे रखा।
कार्यक्रम का शुभारंभ पुस्तक के विधिवत विमोचन के साथ हुआ। पुस्तक का लोकार्पण सेंट जॉन्स कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. एस.पी. सिंह, हरविजय बाहिया, डॉ. रंजना बंसल, डॉ. संदीप अग्रवाल, प्रो. निबीर घोष, डॉ. अशोक शर्मा, ऋतु खंडेलवाल तथा डॉ. राजीव भाटिया ने संयुक्त रूप से किया।
कार्यक्रम का संचालन निधि लाल ने किया। उन्होंने लेखक संजय के. रॉय का परिचय देते हुए बताया कि वे देश के अग्रणी सांस्कृतिक उद्यमियों में शामिल हैं। वे टीमवर्क आर्ट्स के प्रबंध निदेशक हैं और भारत सहित विदेशों में आयोजित अनेक प्रतिष्ठित साहित्य, कला एवं सांस्कृतिक उत्सवों से जुड़े रहे हैं। विश्वविख्यात जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के संस्थापक सदस्यों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वे सलाम बालक ट्रस्ट के संस्थापक ट्रस्टी भी हैं तथा कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें ब्रिटेन के यॉर्क विश्वविद्यालय द्वारा मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया जा चुका है।
परिचर्चा के दौरान नीलम मेहरोत्रा और सुधा कपूर ने लेखक से आत्माओं, अदृश्य संसार, परा अनुभवों और रहस्यमयी घटनाओं को लेकर कई सवाल किए। जवाब में संजय के. रॉय ने बताया कि बचपन में कोलकाता स्थित अपने पैतृक घर में मात्र पाँच वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार किसी अदृश्य उपस्थिति का अनुभव किया था। इसके बाद दिल्ली, भारत और विदेशों की यात्राओं के दौरान भी कई ऐसे अनुभव हुए, जिन्होंने उन्हें यह सोचने पर विवश किया कि हमारे ज्ञात संसार के समानांतर भी कोई ऐसा आयाम हो सकता है, जिसे विज्ञान अभी पूरी तरह समझ नहीं पाया है।
उन्होंने कहा कि विज्ञान का कार्य प्रश्न पूछना और प्रमाण तलाशना है, जबकि मनुष्य के कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें तत्काल वैज्ञानिक कसौटी पर नहीं परखा जा सकता। हर अनजानी घटना को अंधविश्वास कहकर नकार देना जितना गलत है, उतना ही बिना तर्क के हर बात पर विश्वास करना भी उचित नहीं। इन अनुभवों को खुले मन, जिज्ञासा और संवेदनशील दृष्टि से समझने की आवश्यकता है। उनके अनुसार हर रहस्य के पीछे किसी न किसी मानवीय स्मृति, भावना या अधूरी कहानी का संसार छिपा होता है।
संजय के. रॉय ने बताया कि यह पुस्तक केवल भूत-प्रेत की कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि संस्मरण, यात्राओं, मानवीय रिश्तों, हास्य, रोमांच और जीवन के अनुत्तरित प्रश्नों से भरी एक आत्मीय यात्रा है। इसमें आत्माओं को भय का प्रतीक नहीं, बल्कि स्मृतियों, अधूरी इच्छाओं और मानवीय भावनाओं के रूप में देखने का प्रयास किया गया है। पुस्तक विज्ञान और अध्यात्म, तर्क और अनुभव के बीच एक संतुलित संवाद स्थापित करती है।
इस अवसर पर पूजा बंसल और अनुपम बोहरा ने पुस्तक के चयनित अंशों का प्रभावशाली पाठ किया। हरविजय बाहिया ने कहा कि यह कृति आत्मकथा, यात्रा-वृत्तांत और अलौकिक अनुभवों का अनूठा संगम है, जिसमें लेखक ने कोलकाता के पैतृक घर से लेकर लुटियंस दिल्ली और भारत सहित विदेशों के अनेक स्थानों पर हुए रहस्यमयी अनुभवों को बेहद जीवंत ढंग से प्रस्तुत किया है।
कार्यक्रम में मनीष बंसल, रजनीश खंडेलवाल, विनोद महेश्वरी, पूनम सचदेवा, राशि गर्ग, कविता अग्रवाल, मोहित महाजन, श्वेता बंसल, दिव्या गोयल सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी एवं बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।