क्या यह सिर्फ़ चुनावी जीत या हिंदू चेतना का पुनर्जागरणः गैर-हिंदी राज्यों में बढ़ते वोट प्रतिशत के बीच बदलते भारत की सियासी दिशा

1947 के विभाजन से शुरू हुई धार्मिक राजनीति की धारा अब नए चरण में दिख रही है। शाहबानो, अयोध्या आंदोलन और 1992 की घटनाओं से उभरी पहचान की राजनीति ने भारतीय जनता पार्टी को मुख्यधारा में लाया। नरेंद्र मोदी के दौर में यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास और नीतिगत फैसलों में दिखा। अब गैर-हिंदी राज्यों में बढ़ता समर्थन सामाजिक बदलाव, मध्यम वर्ग, पहचान और स्थिरता की चाह का संकेत है, जो समावेश या ध्रुवीकरण, दोनों दिशाओं में जा सकता है।

Apr 26, 2026 - 09:45
Apr 26, 2026 - 10:45
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क्या यह सिर्फ़ चुनावी जीत या हिंदू चेतना का पुनर्जागरणः  गैर-हिंदी राज्यों में बढ़ते वोट प्रतिशत के बीच बदलते भारत की सियासी दिशा

-बृज खंडेलवाल-

1947 :  एक लकीर खिंची। नक्शे पर भी, दिलों पर भी। भारत के विभाजन ने उपमहाद्वीप को धर्म के नाम पर दो टुकड़ों में बांट दिया। मुहम्मद अली जिन्ना की दो-राष्ट्र की सोच ने साफ़ कहा- हिंदू और मुसलमान दो अलग सभ्यताएं हैं। नतीजा भयावह था। खून-खराबा। अफरा-तफरी। लाखों लाशें। करोड़ों बेघर।

लेकिन आज़ादी के बाद एक दूसरी कहानी गढ़ी गई। सत्ता ने धर्म को निजी मामला घोषित कर दिया; कम से कम बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए। वहीं, अल्पसंख्यकों के लिए धर्म धीरे-धीरे सार्वजनिक नीति और राजनीति का हिस्सा बन गया।

यहीं से शुरू हुआ वह दौर जिसे आलोचक छद्म-धर्मनिरपेक्षता कहते हैं। बराबरी की तराजू थी, मगर अक्सर वोट-बैंक के बोझ से झुका हुआ।

1985 में यह सच खुलकर सामने आया। शाहबानो मामला ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता देने का रास्ता खोला। अदालत ने संविधान की बात की, इंसाफ़ की बात की। फिर राजनीति ने दस्तक दी। राजीव गांधी की सरकार ने कानून बदल दिया। सवाल उठे। क्या कानून सबके लिए बराबर है? या वह चुनावी गणित के हिसाब से बदलता है?

इसी बीच, अयोध्या धीरे-धीरे एक प्रतीक बनता गया। 1949 में मूर्तियां प्रकट हुईं। 1986 में ताले खुले। फिर शुरू हुई लंबी कानूनी जंग। 1990 के दशक में यह मुद्दा जन-आंदोलन बन गया। लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने इसे देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया।

और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। हिंसा हुई। बहस हुई। लेकिन एक बात साफ़ हो गई; हिंदू पहचान अब दबकर नहीं रहेगी।

राजनीति ने करवट ली। भारतीय जनता पार्टी धीरे-धीरे हाशिए से निकलकर मुख्यधारा में आ गई। 1984 में 2 सीटें। 1989 में 88 सीटें। फिर लगातार विस्तार। 2014 में निर्णायक बदलाव आया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत।

नारा था; “सबका साथ, सबका विकास।” लेकिन इसके पीछे एक और परत थी: सांस्कृतिक आत्मविश्वास। 2019 में अनुच्छेद 370 । उसी वर्ष नागरिकता संशोधन अधिनियम। और 2024 में राम मंदिर का उद्घाटन। समर्थकों के लिए यह ऐतिहासिक न्याय है। आलोचकों के लिए यह बहुसंख्यक वर्चस्व का संकेत। सच शायद दोनों के बीच कहीं खड़ा है।

लेकिन असली कहानी अब उत्तर भारत से बाहर लिखी जा रही है, गैर-हिंदी राज्यों में। पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट-प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है। असम में उसने अपनी पकड़ मजबूत की है। यह सिर्फ़ सीटों का खेल नहीं है। यह सामाजिक बदलाव का संकेत है।

दक्षिण भारत में तस्वीर अलग जरूर है, लेकिन स्थिर नहीं। तमिलनाडु और केरल में भाजपा बढ़त ले चुकी  है,  युवा मतदाताओं में उसकी स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है।

यह बदलाव क्यों? एक वजह है- उभरता हुआ मध्यम वर्ग। वह अब सिर्फ़ रोज़गार नहीं चाहता। वह पहचान और आत्मसम्मान भी चाहता है। दूसरी वजह है सुरक्षा और स्थिरता का वादा और तीसरी सांस्कृतिक पुनर्प्रस्तुति।

मंदिर, त्योहार, प्रतीक: अब सिर्फ़ परंपरा नहीं, राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं। और सबसे अहम है “पीड़ित बहुसंख्यक” की भावना का क्षरण। उसकी जगह ले रहा है एक नया आत्मविश्वास।

क्या यह सचमुच हिंदू पुनर्जागरण है? इतिहास बताता है, पुनर्जागरण सिर्फ़ धर्म का नहीं होता। वह पहचान, सत्ता और मनोविज्ञान का संगम होता है। भारत में जो हो रहा है, वह कुछ वैसा ही दिखता है। धर्म अब सिर्फ़ आस्था नहीं रहा; वह राजनीतिक ऊर्जा में बदल चुका है।

लेकिन हर उभार अपने साथ जोखिम भी लाता है। क्या यह समावेशी रहेगा? या नई दीवारें खड़ी करेगा?

आज का भारत एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ समावेश का है तो दूसरा पहचान की टकराहट और ध्रुवीकरण का। फैसला जनता करेगी। लेकिन संकेत साफ़ हैं। हवा बदल रही है।

और इस बार उसकी दिशा सिर्फ़ दिल्ली तय नहीं कर रही, कोलकाता, गुवाहाटी, चेन्नई और तिरुवनंतपुरम भी इस नई हवा को आकार दे रहे हैं।

SP_Singh AURGURU Editor