तीन बागी विधायकों को साथ लेकर भाजपा करने जा रही सपा पर वार, 2027 से पहले अखिलेश के सियासी कुनबे में सेंधमारी

लखनऊ। समाजवादी पार्टी से बगावत कर चुके तीन विधायकों को 14 अक्टूबर को भाजपा में शामिल कराने की तैयारी महज दलबदल का घटनाक्रम नहीं है। इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को राजनीतिक संदेश देने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। गौरीगंज के विधायक राकेश प्रताप सिंह, गोसाईंगंज के विधायक अभय सिंह और कालपी के विधायक विनोद चतुर्वेदी की भाजपा में प्रस्तावित एंट्री के लिए अमेठी में बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इसमें भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव स्मृति ईरानी समेत कई वरिष्ठ नेताओं के शामिल होने की संभावना है।

Oct 9, 2026 - 08:17
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तीन बागी विधायकों को साथ लेकर भाजपा करने जा रही सपा पर वार, 2027 से पहले अखिलेश के सियासी कुनबे में सेंधमारी

इन तीनों विधायकों ने 2024 के राज्यसभा चुनाव में सपा के निर्देशों के विपरीत भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया था। इसके बाद से उनका सपा नेतृत्व से राजनीतिक अलगाव स्पष्ट होता गया। अब उन्हें एक साथ पार्टी में शामिल कराने की तैयारी के जरिए भाजपा यह संकेत देना चाहती है कि सपा से असंतुष्ट नेताओं के लिए उसके दरवाजे खुले हैं। यह कदम अखिलेश यादव के सामने अपने विधायकों और नेताओं को एकजुट रखने की चुनौती को भी चर्चा में लाता है। हालांकि, तीन नेताओं के पार्टी छोड़ने से सपा के पूरे संगठन पर क्या असर पड़ेगा, यह उनके व्यक्तिगत प्रभाव और संबंधित क्षेत्रों में राजनीतिक स्थिति पर निर्भर करेगा।

तीनों विधायक अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से आते हैं और अपने क्षेत्रों में राजनीतिक पहचान रखते हैं। भाजपा की कोशिश ऐसे नेताओं को साथ लेकर स्थानीय स्तर पर अपना संपर्क और संगठनात्मक आधार बढ़ाने की हो सकती है। यह उन क्षेत्रों में भी सियासी समीकरणों को प्रभावित करने का प्रयास है, जहां इन नेताओं का अपना समर्थक वर्ग है। वैसे यह लगभग तय माना जा रहा है कि भाजपा में एंट्री से पहले तीनों विधायकों ने अपनी टिकट की बात पक्की कर ली होगी।

राकेश प्रताप सिंह ने भाजपा में शामिल होने के फैसले के साथ सपा पर परिवारवाद और जातिवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। उन्होंने सपा के पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के राजनीतिक नारे पर भी सवाल उठाए हैं। भाजपा इन बयानों को सपा के सामाजिक गठजोड़ पर सवाल खड़े करने के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर सकती है।

भाजपा ने तीनों विधायकों की सदस्यता कार्यक्रम के लिए अमेठी को चुना है और इसमें कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी की तैयारी है। इससे इस घटनाक्रम को केवल औपचारिक सदस्यता तक सीमित रखने के बजाय राजनीतिक रूप से प्रमुखता देने का संकेत मिलता है। भाजपा के लिए यह दिखाने का अवसर है कि चुनाव से पहले वह दूसरे दलों के ऐसे नेताओं को अपने साथ ला सकती है, जो पहले से चुनावी राजनीति में सक्रिय हैं। सपा के लिए यह अपने संगठन और संभावित उम्मीदवारों के बीच भरोसा बनाए रखने की चुनौती भी है।

इस घटनाक्रम का सबसे स्पष्ट संदेश यह है कि भाजपा 2027 से पहले सपा से अलग हुए प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़कर विपक्षी खेमे पर राजनीतिक दबाव बनाना चाहती है। दूसरी ओर, अखिलेश यादव के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने और अपने सामाजिक गठजोड़ को मजबूत रखने की चुनौती रहेगी। फिलहाल इसे भाजपा की रणनीतिक पहल और सपा के लिए राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन चुनावी असर का आकलन केवल इन तीन विधायकों के दलबदल के आधार पर नहीं किया जा सकता।

SP_Singh AURGURU Editor