कीचड़ में फंसी ट्रैक्टर-ट्रॉली, प्रसव पीड़ा से तड़पती रही गर्भवती, जैसे-तैसे सीएचसी पहुंचे भी तो वहां से टरका दिया गया, भरोसा नहीं होता कि आजादी के 80 साल बाद भी आगरा के इस गांव को सड़क का इंतजार है

-नीरज परिहार- पिनाहट (आगरा)। जनपद के बाह ब्लॉक क्षेत्र में विकास के दावों की हकीकत सामने आई है। यमुना के बीहड़ों में बसे सुंसार गांव की एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होने पर एंबुलेंस तक नसीब नहीं हुई। मजबूरी में परिजन उसे ट्रैक्टर-ट्रॉली से अस्पताल ले जाने निकले, लेकिन बारिश से दलदल बने कच्चे रास्ते में ट्रॉली फंस गई। ग्रामीणों ने फावड़ों से कीचड़ हटाया, सिल्ट डालकर रास्ता बनाया और किसी तरह पक्की सड़क तक पहुंचे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आजादी के करीब 80 वर्ष बाद भी आगरा जिले का यह गांव पक्की सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से क्यों वंचित है?

Jul 10, 2026 - 19:51
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कीचड़ में फंसी ट्रैक्टर-ट्रॉली, प्रसव पीड़ा से तड़पती रही गर्भवती, जैसे-तैसे सीएचसी पहुंचे भी तो वहां से टरका दिया गया, भरोसा नहीं होता कि आजादी के 80 साल बाद भी आगरा के इस गांव को सड़क का इंतजार है
बाह क्षेत्र के सुंसार गांव का कच्चा रास्ता, जो बारिश के कारण दलदल में बदल चुका है। इसी में फंसी वह ट्रैक्टर ट्राली जिसमें प्रसूता थी।

बृहस्पतिवार तड़के बाह क्षेत्र के सुंसार गांव निवासी रामब्रज की पत्नी कृष्णा को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। गांव तक सड़क नहीं होने और एंबुलेंस के न पहुंच पाने के कारण परिजनों ने गर्भवती को ट्रैक्टर-ट्रॉली में बैठाया। बारिश से बचाने के लिए ऊपर तिरपाल तान दी गई और बाह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) के लिए सफर शुरू हुआ। लेकिन यह सफर इलाज से ज्यादा जिंदगी बचाने की जंग बन गया।

कीचड़ में फंस गई ट्रॉली, फावड़े लेकर पहुंचे ग्रामीण

बारिश के कारण गांव से निकलने वाला कच्चा रास्ता पूरी तरह दलदल में बदल चुका था। कुछ दूर चलते ही ट्रैक्टर-ट्रॉली कीचड़ में धंस गई। गर्भवती दर्द से कराहती रही। इसके बाद परिवार के लोग और ग्रामीण फावड़े लेकर मौके पर पहुंचे। घंटों मशक्कत कर कीचड़ हटाया गया और फिसलन रोकने के लिए रास्ते पर सिल्ट डाली गई। इसके बाद किसी तरह ट्रॉली को बाहर निकाला जा सका।

रास्ता इतना खराब था कि कई बार ट्रॉली पलटते-पलटते बची। ट्रॉली में बैठी प्रसूता कृष्णा और उसके साथ मौजूद महिलाओं की जान पर भी खतरा मंडराता रहा। आखिरकार काफी संघर्ष के बाद परिजन पक्की सड़क तक पहुंच सके।

सीएचसी से मिली निराशा, निजी अस्पताल ले जाना पड़ा

परिजन गर्भवती को बाह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे, लेकिन वहां चिकित्सकों ने यह कहते हुए उसे वापस भेज दिया कि अभी प्रसव का समय नहीं हुआ है। लगातार दर्द से परेशान कृष्णा की हालत को देखते हुए परिजन उसे फतेहाबाद के एक निजी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उसे भर्ती कराया गया।

सड़क के लिए आंदोलन भी, चुनाव बहिष्कार भी, फिर भी नहीं बदली तस्वीर

ग्रामीणों का कहना है कि सुंसार गांव आजादी के बाद से ही पक्की सड़क की सुविधा का इंतजार कर रहा है। वर्षों से जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से सड़क निर्माण की मांग की जाती रही, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिले।

ग्रामीणों ने सड़क निर्माण के लिए कई बार आंदोलन किए। इतना ही नहीं, जनप्रतिनिधियों का ध्यान खींचने के लिए चुनाव बहिष्कार तक किया, लेकिन हालात नहीं बदले। अब ग्रामीणों ने सड़क बनवाने के लिए फिर से आंदोलन तेज करने का फैसला किया है।

एंबुलेंस भी नहीं पहुंच सकती गांव

ग्रामीणों के अनुसार गांव तक पक्का रास्ता न होने के कारण 108 एंबुलेंस सेवा भी गांव के अंदर नहीं पहुंच पाती। किसी भी मरीज, गर्भवती महिला या गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को पहले ट्रैक्टर, बैलगाड़ी या अन्य साधनों से मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है। बरसात के दिनों में यह मुश्किल कई गुना बढ़ जाती है।

विकास के दावों पर बड़ा सवाल

केंद्र और प्रदेश सरकारें गांव-गांव सड़क, स्वास्थ्य और बेहतर संपर्क व्यवस्था के दावे करती हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना सहित कई योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन आगरा जैसे जिले के बाह क्षेत्र का सुंसार गांव आज भी मूलभूत सुविधा से वंचित है।

एक गर्भवती महिला का अस्पताल तक पहुंचना यदि संघर्ष बन जाए, तो यह केवल एक गांव की समस्या नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर विफलता है। सवाल यह भी है कि आखिर जिम्मेदार विभाग और जनप्रतिनिधि कब तक ऐसे गांवों को केवल आश्वासन देते रहेंगे?

ग्रामीणों की मांग

ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि सुंसार गांव को तत्काल पक्की सड़क से जोड़ा जाए, ताकि भविष्य में किसी गर्भवती, मरीज या आपात स्थिति में किसी भी ग्रामीण को अपनी जान जोखिम में डालकर अस्पताल न पहुंचना पड़े।

आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी यदि किसी गांव की महिलाओं को प्रसव पीड़ा में ट्रैक्टर-ट्रॉली और कीचड़ भरे रास्तों का सहारा लेना पड़े, तो यह केवल विकास की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल है।

SP_Singh AURGURU Editor