‘आत्म सुवास’ से महकी कविता की परंपरा, साहित्य समारोह में हुआ भव्य लोकार्पण
आगरा। स्व. इंद्रजीत सिंह भदौरिया की 97वीं जयंती की पूर्व संध्या पर संजय प्लेस स्थित यूथ हॉस्टल में आयोजित आगरा साहित्य समारोह 2025 में वरिष्ठ कवि हरीश कुमार सिंह भदौरिया के काव्य संग्रह ‘आत्म सुवास’ का भव्य लोकार्पण संपन्न हुआ। समारोह में साहित्य, संस्कृति और संवेदना की सुवास ने साहित्य प्रेमियों को गहराई से छुआ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अरुण डंग ने काव्य संग्रह की प्रस्तुति को ‘आत्मा की सच्ची गूंज’ बताया, वहीं समीक्षा करते हुए प्रो. उमापति दीक्षित ने कहा कि आत्म सुवास’ केवल कविता नहीं, समाज की आत्मा का चित्रण है। सामाजिक विषमता, आत्ममंथन और मानवीय पीड़ा के भावों को कवि ने अत्यंत प्रभावी शैली में गूंथा है।
कवि हरीश भदौरिया ने बताया कि यह संग्रह चार खंडों में 45 कविताओं का समावेश है, जो अध्यात्म, संघर्ष, करुणा और सामाजिक चेतना जैसे विषयों पर आधारित हैं। उन्होंने कहा, ‘साहित्य मनोरंजन नहीं, बल्कि एक प्रतिबद्ध दर्पण है जो समाज को दिशा देता है।
काव्य-पाठ में गूंजे पिता के प्रति श्रद्धा-सुमन
द्वितीय सत्र में आयोजित काव्य गोष्ठी ‘पिता को समर्पित’ थी, जिसमें देशभर से आए कवियों ने भावविभोर कर देने वाली कविताएं सुनाईं।
वे ज़िंदगी की खुशियाँ मेरे नाम कर गए…’ (हरीश कुमार सिंह भदौरिया),
‘पिता लगते भले पर्वत, सरोवर भी होते हैं…’ (डॉ. राजेंद्र मिलन),
‘पिता नहीं वह गुरु रहे, राख परस्पर प्यार...’ (डॉ. अशोक 'अश्रु'),
‘पिता मेरे पावन स्मृति…’ (डॉ. शैलबाला अग्रवाल),
‘डटें जो कर्म के पथ पर, विजय की राह पाएंगे…’ (वंदना चौहान),
‘मिल गई पहचान ऐसी काम से…’ (डॉ. ऋतु अग्रवाल, मेरठ) ,
‘मातु-पिता की वंदना करिए आठों याम…’ (डॉ. संतोष सम्प्रीति. दिल्ली) ,
‘बंद हो गई चिट्ठी-पत्री, व्हाट्सएप पर पैग़ाम बहुत हैं…’ (डॉ. सुनील तिवारी, कानपुर) ,
‘यार सब तो पुराने हो गये…’ (श्रीपाल शर्मा 'ईदरीशपुरी', बागपत),
‘जिंदगी स्वर्ण सी थी हमारी बहुत… (कुमार जे. संतोष),
‘माफ़ करते हैं वे हर खता के लिए… (नीलम रानी गुप्ता, आगरा) जैसी रचनाओं ने भावनाओं की लहरें दौड़ा दीं।
समारोह के अन्य अतिथियों में एलडी अग्रवाल, डॊ. सुनीता गर्ग और कुसुम चतुर्वेदी रहे। संचालन सुशील सरित ने किया। Top of Form
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