जलकुंभी से बदली तकदीर: पीलीभीत टाइगर रिजर्व की अनोखी पहल से महिलाओं को मिला रोजगार, पर्यावरण संरक्षण को भी मिली नई ताकत
-आरके सिंह- बरेली/पीलीभीत। जिस जलकुंभी को वर्षों से तालाबों, झीलों और नदियों के लिए सबसे बड़ी समस्या माना जाता रहा, वही अब ग्रामीण महिलाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत माध्यम बन गई है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) और विश्व प्रकृति निधि भारत (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया) की संयुक्त पहल से शुरू किया गया 'जलकुंभी हस्तशिल्प कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम' न केवल जलाशयों को आक्रामक खरपतवार से मुक्त करने में मदद कर रहा है, बल्कि महिलाओं को हरित उद्यमिता से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने का भी सशक्त माध्यम बन रहा है।

जलकुंभी को आकार देती एक महिला।
इस अनूठी पहल ने पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के बीच ऐसा संतुलन स्थापित किया है, जिसे भविष्य के लिए एक आदर्श मॉडल माना जा रहा है। अब जलकुंभी से तैयार आकर्षक और उपयोगी उत्पाद बाजार में पहचान बना रहे हैं और महिलाओं के जीवन में आर्थिक बदलाव ला रहे हैं।
मुख्य वन संरक्षक पी.पी. सिंह ने बताया कि इस योजना के तहत चूका इको-टूरिज्म, जंगल सफारी और अन्य पर्यटन स्थलों पर स्थानीय हस्तशिल्प बिक्री केंद्र स्थापित किए जाएंगे। इससे पर्यटक सीधे ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किए गए उत्पाद खरीद सकेंगे और उन्हें बेहतर बाजार उपलब्ध होगा।
उन्होंने बताया कि भविष्य में शहद, औषधीय पौधों, बांस तथा अन्य गैर-काष्ठ वन उत्पादों के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर भी कार्य किया जाएगा, जिससे ग्रामीणों की आय में और वृद्धि हो सके। साथ ही मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और सीमावर्ती गांवों के लोगों को वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध कराने के लिए वन विभाग एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से प्रशिक्षण और सामुदायिक विकास कार्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं।
डीएफओ मनीष सिंह के मार्गदर्शन में साकार हुई योजना
पीलीभीत टाइगर रिजर्व के प्रभागीय वनाधिकारी मनीष सिंह के मार्गदर्शन में इस महत्वाकांक्षी योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया गया। योजना का मुख्य उद्देश्य जलाशयों में तेजी से फैलने वाली जलकुंभी की समस्या का स्थायी समाधान निकालना और टाइगर रिजर्व से जुड़े गांवों की महिलाओं को स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार उपलब्ध कराना है।
विश्व प्रकृति निधि भारत के सहयोग से स्थानीय सामुदायिक संस्थाओं और स्वयं सहायता समूहों को जोड़कर उनकी क्षमता विकसित की जा रही है, ताकि प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन ग्रामीण विकास की मुख्यधारा का हिस्सा बन सके।
पुरैना गांव बना हरित परिवर्तन का केंद्र
इस पर्यावरण-अनुकूल पहल के तहत पीलीभीत टाइगर रिजर्व की बराही रेंज के अंतर्गत आने वाले ग्राम पुरैना (महाराजपुर) में विशेष कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
जलकुंभी एक अत्यंत आक्रामक जलीय खरपतवार है, जो जलाशयों में तेजी से फैलकर ऑक्सीजन का स्तर कम कर देती है और जलीय जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। इसके कारण नौकायन, सिंचाई और मत्स्य पालन जैसी गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं, जिससे स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
इसी समस्या को अवसर में बदलते हुए जलाशयों से हटाई गई जलकुंभी को हस्तशिल्प निर्माण के कच्चे माल के रूप में उपयोग करने की रणनीति अपनाई गई। इससे एक ओर जलाशयों की सफाई हो रही है तो दूसरी ओर महिलाओं के लिए आय का नया स्रोत तैयार हुआ है।
25 महिलाओं ने सीखा हस्तशिल्प निर्माण का हुनर
मुख्य प्रशिक्षक शशिकला के नेतृत्व में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में स्थानीय स्वयं सहायता समूहों की 25 महिलाओं ने भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को जलकुंभी के रेशों को सुखाकर उनसे आकर्षक और टिकाऊ उत्पाद तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।
महिलाओं ने जलकुंभी से पेन स्टैंड, फैंसी टोपी, कृत्रिम फूल, विभिन्न आकार की टोकरियां, चटाइयां (मैट), सर्विंग ट्रे और आधुनिक डिजाइन के बैग तैयार करना सीखा। इन उत्पादों की बाजार में अच्छी मांग है और इनके निर्माण से महिलाओं को घर बैठे अतिरिक्त आय प्राप्त होने लगी है। इससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार आ रहा है और सामाजिक सशक्तिकरण भी बढ़ रहा है।
प्लास्टिक का विकल्प बन रहे प्राकृतिक उत्पाद

यह कार्यक्रम केवल रोजगार तक सीमित नहीं है बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जलकुंभी से तैयार उत्पाद सिंगल-यूज प्लास्टिक का प्राकृतिक और जैव अपघटनीय विकल्प बनकर उभर रहे हैं।
स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं में उद्यमशीलता की भावना विकसित हो रही है और सामूहिक उत्पादन को बढ़ावा मिल रहा है। इससे महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ हरित अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।
देश के लिए बन रहा प्रेरणादायी मॉडल
पीलीभीत टाइगर रिजर्व और विश्व प्रकृति निधि भारत की यह पहल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, महिला आत्मनिर्भरता, हरित रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक साथ मजबूत करने का सफल उदाहरण बनकर सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल को देश के अन्य हिस्सों में भी अपनाया जाए तो जलकुंभी जैसी पर्यावरणीय समस्या का समाधान करते हुए हजारों ग्रामीण महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है।