आंखों के सामने अन्याय पर भी खामोश समाज किस नैतिक बल पर दुनिया की रक्षा करेगा? वरिष्ठ कथाकार दीर्घ नारायण ने कहानी 'भारत (न्यू) लोग' के जरिए व्यवस्था और समाज पर किए तीखे सवाल, 'क़िस्सा कहानी-7' में साहित्यकारों ने किया गहन विमर्श
आगरा। समाज की संवेदनहीनता, लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण और आम नागरिक की चुप्पी पर तीखे सवाल उठाती वरिष्ठ हिंदी कथाकार दीर्घ नारायण की चर्चित कहानी 'भारत (न्यू) लोग' का पाठ रविवार को शहर के साहित्यिक मंच 'क़िस्सा कहानी-7' में हुआ। कहानी के माध्यम से कथाकार ने वर्तमान सामाजिक व्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा, संविधान की मूल भावना और बढ़ती आर्थिक असमानता पर बेबाक टिप्पणी करते हुए श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए विवश कर दिया। कहानी पाठ के बाद साहित्य प्रेमियों ने जिज्ञासापूर्ण प्रश्न पूछे और कहानी के विभिन्न पक्षों पर खुलकर चर्चा की।
नागरी प्रचारिणी सभा के लाइब्रेरी हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम की प्रस्तुति सांस्कृतिक संस्था 'रंगलीला' एवं कहानी पत्रिका 'कथादेश' (नई दिल्ली) ने संयुक्त रूप से की, जबकि 'शीरोज़' संगठन इसका आयोजक रहा।
उद्घाटनकर्ता के रूप में पूर्णिया (बिहार) से आए वरिष्ठ कथाकार दीर्घ नारायण ने अपनी चर्चित कहानी 'भारत (न्यू) लोग' का पाठ किया। कहानी के एक मार्मिक अंश में उन्होंने कहा कि जिस समाज में लोग अपनी आंखों के सामने घट रही घटनाओं पर आवाज तक नहीं उठा पाते, वह दुनिया की सुरक्षा का दावा किस नैतिक आधार पर कर सकता है। उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए संविधान की प्रस्तावना को भी प्रतीकात्मक रूप में नए संदर्भों से जोड़कर प्रस्तुत किया।
मुख्य वक्ता वरिष्ठ रंगकर्मी एवं लेखिका प्रो. ज्योत्स्ना रघुवंशी ने कहा कि यह कहानी कहानी और रिपोर्ताज का सशक्त मिश्रण है, जो पाठक को झकझोरने के बजाय भीतर तक जड़ कर देती है। उन्होंने कहा कि कहानी पढ़ने के बाद कई दिनों तक वह मानसिक रूप से विचलित रहीं और दोबारा पढ़ने का साहस नहीं जुटा सकीं।
मुख्य अतिथि लेखक एवं चिकित्सक डॉ. मुनीश्वर गुप्ता ने कहा कि निर्भया जैसी घटनाएं आज भी देश के अंतर्मन को झकझोरती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसे जघन्य अपराधों के दोषी कई बार व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाकर बच कैसे जाते हैं।
कथादेश के संपादक हरिनारायण की गरिमामयी उपस्थिति रही। विशिष्ट अतिथि अरुण डंग ने बदलते वैश्विक सामाजिक परिवेश पर चिंता व्यक्त करते हुए लोगों से अधिक संवेदनशील बनने का आह्वान किया।
कार्यक्रम का संयोजन वरिष्ठ कथाकार शक्ति प्रकाश ने किया। उन्होंने कहा कि कहानी प्रभावशाली होने के बावजूद उन्हें यह महसूस हुआ कि लेखक ने किशोरी पात्र को एक जीवंत चरित्र के बजाय प्रतीक के रूप में अधिक प्रस्तुत किया है। अध्यक्षता वरिष्ठ रचनाकार रमेश पंडित ने की। उन्होंने कहा कि रक्षा संपदा जैसे महत्वपूर्ण विभाग में प्रशासनिक दायित्व निभाते हुए भी दीर्घ नारायण ने लगभग 70 कहानियां लिखीं, जिनमें से अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।
कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन रंगलीला के निर्देशक अनिल शुक्ल ने किया, जबकि संचालन उर्दू लेखिका एवं कथाकार प्रो. नसरीन बेगम ने किया। अतिथियों का स्वागत अर्जुन सवेदिया, डॉ. महेश धाकड़, राम भरत उपाध्याय, शंकर देव तिवारी एवं अर्निका माहेश्वरी ने किया।
कहानी पाठ के बाद श्रोताओं ने कहानी पर अपनी प्रतिक्रियाएं देते हुए कई जिज्ञासापूर्ण प्रश्न पूछे। रामनाथ, डॉ. पी.एस. कुशवाह एवं डॉ. सुरेंद्र सिंह ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम में प्रो. सुषमा सिंह, प्रो. आभा चतुर्वेदी, शलभ भारती, भावना रघुवंशी, रुनू दत्ता, राम शर्मा, दिलीप रघुवंशी, प्रो. कमलेश नागर, सुनीत कुलश्रेष्ठ आलोक, डॉ. कुमकुम श्रीवास्तव, सुनयन शर्मा, ओम ठाकुर, डॉ. राजीव शर्मा 'निस्पृह', अमरजीत सिंह, शिव नारायण सिंह, रोमी चौहान, शुभम जाखड़, रंजीत गुप्ता, नरेश तन्हा, कामेश मिश्र 'सनसनी', अभिषेक माहेश्वरी सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।
आगरा की कहानी परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास
कार्यक्रम के दौरान रंगलीला के निर्देशक एवं वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अनिल शुक्ल ने कहा कि उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में आगरा हिंदी कहानी की समृद्ध परंपरा का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां लल्लूलाल, अमृतलाल नागर, रांगेय राघव, राजेंद्र यादव, रावी, घनश्याम अस्थाना और विभांशु दिव्याल जैसे महत्वपूर्ण कथाकार हुए। उन्होंने कहा कि क़िस्सा कहानी का उद्देश्य हिंदी, उर्दू एवं अन्य भारतीय भाषाओं की समकालीन कहानियों को पाठकों और श्रोताओं तक पहुंचाकर आगरा की साहित्यिक परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान करना है।