जब पूरा हिंदुस्तान गाता था: दूरदर्शन के वे यादगार जिंगल, जो विज्ञापन नहीं, एक दौर की पहचान बन गए

दूरदर्शन के दौर के विज्ञापन सिर्फ उत्पाद बेचने का माध्यम नहीं थे, बल्कि वे भारतीय परिवारों की सामूहिक स्मृतियों, संगीत, हास्य और बदलते मध्यमवर्गीय जीवन का हिस्सा बन गए थे। निरमा, हमारा बजाज, लिरिल, लाइफबॉय, रसना, मैगी और ओनिडा जैसे जिंगल आज भी उस दौर की सादगी और रचनात्मकता की याद दिलाते हैं।

Aug 30, 2026 - 11:45
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जब पूरा हिंदुस्तान गाता था: दूरदर्शन के वे यादगार जिंगल, जो विज्ञापन नहीं, एक दौर की पहचान बन गए
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-बृज खंडेलवाल-

एक ज़माना था जब हिंदुस्तान में टीवी का मतलब सिर्फ दूरदर्शन था। एक चैनल, एक आवाज़, एक शाम। रिमोट का आतंक नहीं, मोबाइल की घंटी नहीं, रील्स-शॉर्ट्स नाम की कोई आफ़त नहीं। पूरा परिवार एक ही कमरे में बैठता था; कभी फर्श पर, कभी सोफे पर, और जब विज्ञापन आता तो कोई पानी लेने नहीं उठता था। कई बार विज्ञापन ही कार्यक्रम से ज़्यादा याद रह जाते थे।

सत्तर से अस्सी और नब्बे के दशक भारतीय टेलीविजन विज्ञापन का सुनहरा दौर था। केबल टीवी ने अभी दस्तक नहीं दी थी। इंटरनेट तो साइंस-फिक्शन की कहानी लगता था। विज्ञापन छोटे थे, मगर उनका असर लंबा। धुन सीधी थी, बोल आसान थे और संदेश सीधे दिल में उतर जाता था। आज के करोड़ों रुपये वाले विज्ञापन देखकर कभी-कभी लगता है, तब विज्ञापन बनाए जाते थे ताकि याद रहें; आज विज्ञापन बनाए जाते हैं ताकि “क्रिएटिव” दिखें। आइए, उन दिनों के कुछ दिलचस्प, यादगार जिंगल याद करें, और थोड़ी सी उनकी कहानी भी।

निरमा

कानों में बस जाने वाला जिंगल- ”वाशिंग पाउडर निरमा... दूध से सफेदी, निर्माण से आई,”

इसके आगे किसी परिचय की जरूरत नहीं। सफेद कपड़ों में घूमती लड़कियां, झाग और दूध जैसी सफेदी का दावा। मगर इसके पीछे एक असली अंडरडॉग कहानी थी। 1969 में गुजरात के एक लैब टेक्नीशियन करसनभाई पटेल ने साइकिल पर बैठकर घर-घर डिटर्जेंट बेचना शुरू किया। नाम रखा निरमा, अपनी बेटी निरुपमा के नाम पर। कीमत सिर्फ 3.50 रुपये किलो, जबकि सर्फ 13 रुपये पर बैठता था।

जिंगल पहले रेडियो पर 1975 में आया, फिर 1982 में टीवी पर। पूर्णिम विज्ञापन एजेंसी ने उसे बनाया। “हेमा, रेखा, जया और सुषमा… सबकी पसंद निरमा”, ये नाम सिर्फ नाम नहीं थे, वे हर भारतीय घर की औरतें थीं। मां गुनगुनाती थीं, बच्चे गुनगुनाते थे और पिताजी भी बोल भूलने का नाटक करते हुए पूरा जिंगल जानते थे। एक समय तो मांग इतनी बढ़ गई कि कंपनी ने जानबूझकर स्टॉक वापस खींच लिया। निरमा ने साबित किया कि विज्ञापन में शेक्सपियर नहीं चाहिए। एक आसान धुन, कुछ सीधे शब्द और भरपूर दोहराव, बस, काम तमाम।

हमारा बजाज

मध्यमवर्ग का राष्ट्रगीत बना। “बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज।” यह सिर्फ स्कूटर का विज्ञापन नहीं था। यह उभरते हुए भारतीय मध्यमवर्ग का सपना था। स्कूटर पर बच्चे, पत्नी, पति और कभी-कभी रिश्तेदार भी। वही स्कूटर दफ्तर जाता था, बच्चों को स्कूल छोड़ता था और रविवार को पूरा परिवार पिकनिक पर ले जाता था।

लिरिक्स जयकृष्ण रावत के, संगीत लुईस बैंक्स का (राग जयजयवंती में), निर्देशन सुमंत्र घोषाल का। लिंटास की टीम ने इसे इतना भावुक बनाया कि यह देशभक्ति का गान लगने लगा। बजाज ने वाहन नहीं बेचा। उसने आकांक्षा बेची, एक ऐसा भारत जहां आम आदमी भी “बुलंद” महसूस कर सके।

लिरिल : झरने के नीचे आज़ादी

“ला ला ला ला… लिरिल।” झरना, झाग, ताजगी और बेफिक्री। 1974-75 में एलिक पदमसी की टीम ने कोडाईकनाल के पंबर फॉल्स में एयर इंडिया की स्टुअर्डेस कैरेन लुनेल को झरने के नीचे खड़ा किया। ठंड में, बर्फीले पानी में। नतीजा? साबुन को नहाने की चीज़ से उठाकर आज़ादी और फ्रेशनेस का प्रतीक बना दिया। दिलचस्प बात यह कि जिंगल का मूल मेलोडी जर्मन साबुन “फा” के विज्ञापन से प्रेरित था, मगर वानराज भाटिया ने उसमें भारतीय स्पर्श जोड़ दिया। नहाना अचानक एक रोमांचक अनुभव लगने लगा। विज्ञापन ने साबुन कम बेचा, कल्पना ज्यादा बेची।

लाइफबॉय : सेहत की पहरेदारी

“तंदुरुस्ती की रक्षा करता है लाइफबॉय। लाइफबॉय है जहां, तंदुरुस्ती है वहां।” सीधा, बिना फिल्मी ड्रामा। कीटाणुओं के खिलाफ मोर्चा खोलो और साबुन का इस्तेमाल करो। गंदे मैदान में खेलते बच्चे, पसीने से लथपथ खिलाड़ी, फिर लाइफबॉय। न कोई लंबी कहानी, न मनोवैज्ञानिक प्रोफाइलिंग। बस समस्या, समाधान और याद रह जाने वाली धुन।

विक्स: खिच-खिच का इलाज

“विक्स की गोली लो, खिच-खिच दूर करो।” क्या शानदार सादगी थी! गले में खिच-खिच हुई, विक्स की गोली आई और समस्या गई। जयंत कृपलानी वाले उस विज्ञापन ने दो पंक्तियों में काम निपटा दिया। आज के विज्ञापन में पहले समस्या खोजी जाती है, फिर उपभोक्ता की साइकोलॉजी बनाई जाती है। विक्स ने मामला दो लाइन में निपटा दिया।

विको टर्मरिक : छह शब्दों की बाज़ीगरी

“विको टर्मरिक, नहीं कॉस्मेटिक”। बस छह शब्द। परंपरा, आयुर्वेद और भारतीयता को आधुनिक विज्ञापन भाषा में पैक कर दिया गया। पीली ट्यूब घर-घर पहचानी जाने लगी। आज भी उसका नाम सुनते ही पुराना दूरदर्शन सामने आ जाता है।

रसना : बचपन का स्वाद

 “I love you, Rasna.”

रसना सिर्फ पेय नहीं था। वह गर्मियों की छुट्टियां थीं। घर में आए रिश्तेदार थे। रसोई में तैयार होता ठंडा शरबत था। बच्चों की खुशी थी। उस छोटी-सी बच्ची की आवाज़ ने एक पाउडर को बचपन की याद बना दिया।

मैगी : मम्मी, मैं भूखा हूं!

“Fast to cook, good to eat.” मैगी ने भारतीय रसोई में समय की नई परिभाषा लिखी। बच्चा भूखा है। मां व्यस्त है। समाधान सामने है: दो मिनट की मैगी। बाद में दो मिनट पर बहस हो सकती है। लेकिन भारतीय मां और बच्चे के बीच मैगी की दोस्ती पर बहस की जरूरत नहीं।

पान पराग : स्वागत में क्या है?

“पान पराग से स्वागत कीजिए।” शम्मी कपूर, अशोक कुमार, बाराती और शादी का पूरा फिल्मी माहौल। पान पराग ने भारतीय मेहमाननवाज़ी को विज्ञापन में बदल दिया। थोड़ा नाच, थोड़ा गाना, थोड़ा दिखावा और खूब सारा उत्सव। भारतीय शादी में जितना ड्रामा होता है, विज्ञापन ने उतना ही स्क्रीन पर डाल दिया, साथ में दहेज-विरोधी संदेश भी छिपा दिया।

ओनिडा : पड़ोसी की जलन

“Neighbour’s envy, owner’s pride.”

और वह शैतान! ओनिडा ने टीवी को मनोरंजन के साधन से उठाकर प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिया। आपके घर में टीवी है? तो पड़ोसी को जलना चाहिए! यह उस बदलते भारत की निशानी थी, जहां उपभोक्तावाद धीरे-धीरे दरवाजे पर दस्तक दे रहा था।

और भी बहुत कुछ था 

लिज्जत पापड़ का “कुर्रम कुर्रम”, अमूल के चुटीले विज्ञापन, बजाज के भावुक अभियान और सबसे बढ़कर “मिले सुर मेरा तुम्हारा”; ये सब सिर्फ विज्ञापन नहीं थे। ये उस दौर की सामूहिक याददाश्त का हिस्सा थे।

पियूष पांडे, प्रह्लाद कक्कड़, एलिक पदमसी और कई दूसरे रचनात्मक लोगों ने भारतीय विज्ञापन को एक अलग ज़बान दी। उसमें हास्य था, भावना थी, संगीत था और सबसे बड़ी बात, भारतीय मिट्टी की खुशबू थी।

आज विज्ञापन की दुनिया बहुत बड़ी हो गई है। टीवी के साथ यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स और शॉर्ट्स की पूरी फौज खड़ी है। ध्यान की अवधि घट गई है। हर कोई अगले तीन सेकंड में दर्शक को पकड़ लेना चाहता है। रचनात्मकता भी जैसे इंस्टेंट नूडल बन गई है: डालो, पकाओ और भूल जाओ।

आज का मोबाइल वह नया घरेलू तानाशाह है, जिसके सामने पूरा परिवार अलग-अलग स्क्रीन पर झुका बैठा है। रील्स और शॉर्ट्स हमारी जेबों में ऐसे घुस आए हैं जैसे बरसात में कॉकरोच। शोर ज्यादा है। सनसनी ज्यादा है। उत्तेजना ज्यादा है। लेकिन याद रहने वाली रचनात्मकता शायद कम है।

तब एक जिंगल सालों चलता था। आज कई विज्ञापन एक सप्ताह में कूड़ेदान में चले जाते हैं। शायद हमें दूरदर्शन के विज्ञापन नहीं, वह हिंदुस्तान याद आता है जो उनके साथ जुड़ा था।

एक चैनल था। एक ड्राइंग रूम था। पूरा परिवार था। एक जिंगल बजता था और देखते-देखते पूरा हिंदुस्तान गाने लगता था- “वॉशिंग पाउडर निरमा…” क्या वह सचमुच बेहतर दौर था?

SP_Singh AURGURU Editor