अमरीका के टैरिफ से डरना क्यों, जब आत्मबल और संसाधन हमारे पास हैं, रुपया मजबूत करो
भारत को खुद को सस्ता दिखाकर विदेशी निवेश पाने की कोशिश छोड़ देनी चाहिए। रुपये का अवमूल्यन देश की छवि, श्रम और उत्पादों का मूल्य घटाता है। अब समय आ गया है कि भारत आत्मनिर्भर, गुणवत्तापूर्ण और आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़े, न कि विदेशी दबाव में। सशक्त भारत की पहचान सस्ती श्रमशक्ति नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता और आत्मबल से होनी चाहिए।
-डॉ (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
बढ़िया क्वालिटी रहेगी, तो 200 से 1000% भी यदि अमरीका का टैरिफ हो जाए, फिर भी अमरीकी लोग भारत का ही माल खरीदेंगे। हमारा रुपया अमरीकी डॉलर के मुकाबले लगभग 90 रुपये के बराबर है। नरसिम्हा राव की सरकार और डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में रुपये का अवमूलन इसलिए किया गया था ताकि न्यूयॉर्क या टैक्सस में भारतीय वस्तुएं वहां के लोगों को उसी कीमत पर उपलब्ध रहें, जिस पर भारत के लोग खरीदते हैं।
यही सवाल पूछना जरूरी है कि भारत आखिर अमरीका को सस्ता माल बेचने के चक्कर में अपने रुपये को गिराता क्यों गया? हीरा, मोती और जेम्स बेचने के लिए रुपये को नीचे किया गया। वहां के अमरीकी नागरिक और अप्रवासी जब भारत आते हैं, तो उनके डॉलर को जब रूपये में बदला जाता है, तो हज़ार डॉलर लाने वाला अचानक लखपति बन जाता है। यहां का मजदूर और सॉफ्टवेयर इंजीनियर दिन-रात मेहनत करके भी एक लाख महीना नहीं कमा पाता, जबकि वहां एक लेबर को 7.25 डॉलर प्रति घंटा के हिसाब से 6 घंटे काम करने पर 4000 रुपये मिल जाते हैं।
पढ़े-लिखे डॉक्टर, इंजीनियर, अकाउंटेंट और सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स को वहां इससे कई गुना ज्यादा मिलता है। जब भारत में आलू-प्याज-टमाटर 40 रुपये किलो बिकते हैं, तो वहां यह सब 10 से 20 रुपये किलो तक मिल जाते हैं। मैं खुद विदेश और देश दोनों जगह रहा हूं, इसलिए जानता हूं कि हम भारतीयों को अपने हाल पर छोड़ते आए हैं और विदेशियों को सिर पर बैठाते गए हैं।
एक डॉलर में यहां 90 किलो पालक और 9 किलो आलू मिल सकते हैं। क्या इसी रेट पर भारत में किसी भारतीय को इतना सस्ता सामान मिलता है?
लाभ किसे हुआ?
देश से भागे निर्यातक जैसे चोकसी, नीरव मोदी को? या हवाला व्यापारियों को? खाद्य तेल, दाल, चावल, गेहूं आदि के आयात-निर्यात के खेल में भी देश को भारी नुकसान हुआ है। कई बार जब देश में इनकी कमी होती है, तो यही लोग इन्हें घुमा-फिराकर देश में वापस भेजते हैं और दोहरी कमाई करते हैं।
रुपये के अवमूल्यन को रोकना होगा
अगर एक डॉलर की कीमत बीस रुपये हो जाए या एक रुपया = एक डॉलर हो जाए, तो भारत की ब्रह्मोस मिसाइल से लेकर सॉफ्टवेयर तक का निर्यात ज़बरदस्त फायदे में होगा। मांग तो पहले से है, इज्ज़त ही घटती गई है। क्या दस सेंट में एक किलो आलू बेचना भारत को शोभा देता है? क्या अमरीका, इंग्लैंड या कोई नाटो देश इस सस्तेपन से वाकई खुश है?
हमारे पड़ोसी देश भी हमारी देखा-देखी अपनी करेंसी का भारी अवमूल्यन कर चुके हैं। और हम विश्व के श्रेष्ठ क्रिकेट बैट-बॉल भी इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया को सस्ते में भेजकर खुद को धन्य मानते हैं!
बाबा की बैलगाड़ी से अमरीकी मंडी तक, हालात वही हैं
मैनपुरी के बाजारों में जब हमारे बाबा किराए की बैलगाड़ी में अपनी फसल लाते थे, तो वहां के व्यापारी मुंह बिचका कर कहते, ये क्या खराब माल ले आए हो? तीन-चार दिन टरकाया जाता, और अंत में मजबूरी में सस्ते दाम पर फसल बेचनी पड़ती। यही हाल आज अमरीकी मंडियों में भारत का है।
बाबा क्रांतिकारी परिवार से थे, माता-पिता को अंग्रेजों ने मार डाला था। फिर भी अपनी मेहनत पर यकीन कर मंडियों की लूट सहते रहे।
आज भारत तेल आयात पर निर्भर क्यों?
यदि रुपया आज भी इंदिरा गांधी के कार्यकाल जितना मजबूत होता, तो भारत आत्मनिर्भरता की ऊंचाई पर होता। आज हम इस भ्रम में खुश हैं कि रुपया सस्ता है, तो गोरे ज्यादा आते हैं। मेडिकल टूरिज्म चल निकला है। लेकिन सवाल ये है- क्या अमीर लोग आ रहे हैं या छोटे-मोटे कामगार?
जिसके पास पैसा होता है, वह ढाबे नहीं, सात सितारा होटल की तलाश करता है। इसलिए भारत को "चीप डेस्टिनेशन" बनाना बंद करिए। पंजाबी में शब्द है "चीपड़"- हमें क्या सच में खुद को दुनिया के सामने इसी रूप में दिखाते रहना है?
इरकॊन-एलएंडटी को भी मिलना चाहिए सही मूल्य
क्या रुपये के मजबूत होने से एलएंडटी और इरकॊन जैसे भारतीय कंस्ट्रक्शन दिग्गज विदेश में टेंडर नहीं ले पाएंगे? नहीं! असल में तो यही कंपनियां भारत में गुणवत्ता से समझौता कर रहीं हैं। यदि इन्हें सही कीमत विदेश में मिले, तो वे भारत में घटिया निर्माण के बोझ से मुक्त हो सकेंगी। सॉफ्टवेयर, रक्षा उत्पाद, अकाउंटिंग आदि से विदेशी मुद्रा की पूर्ति आराम से हो सकती है।
भारत को किसकी चिंता करनी चाहिए, 140 करोड़ भारतीयों की या 10 करोड़ प्रवासियों की?
जब देश में ही 140 करोड़ लोग हैं, और घुसपैठियों को जोड़ लें तो 150 करोड़ के करीब, तो क्या 8-10 करोड़ प्रवासी भारतीयों की चिंता पहले करें? अमरीका टैरिफ लगाना चाहे तो लगाए। हम भी उसी अनुपात में टैक्स लगा सकते हैं। भारत को आज झुकने की ज़रूरत नहीं है। अमरीका क्या कभी सच्चा दोस्त रहा है, जो आगे रहेगा?
उम्मीद है कि अब भारत सोच बदलेगा
अब समय है कि भारत अपनी सोच बदले- चीप भारत नहीं, सशक्त भारत बनकर उभरे। हम अपने उत्पाद अपने मूल्य पर बेचें, अपनी मुद्रा को गिराकर नहीं। इज्जत और कीमत, दोनों हमें खुद तय करने होंगे। जब तक रुपया मजबूत नहीं होगा, भारत का आत्मबल अधूरा रहेगा।
(लेखक इंडियन आर्मी से सेवानिवृत्त हैं। आप विदेश से प्रकाशित छह चिकित्सा पुस्तकों के लेखक हैं। आपने विश्व के लिए 100 से अधिक नई और नवाचारी चिकित्सकीय उपचार तकनीकों का विकास किया है।)