दिल्ली में कल बुलाई गई बैठक से सुलझेगा पंजाब कांग्रेस का सियासी संग्राम या फिर बनी रहेगी खींचतान?
पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल ने 21 जुलाई को दिल्ली में प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, कोर कमेटी के चेयरमैन सुखजिंदर सिंह रंधावा और चुनाव समितियों से जुड़े नेताओं की बैठक बुलाई है। आधिकारिक तौर पर इसका उद्देश्य 2027 पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियों के तहत चुनाव समितियों का गठन है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे पार्टी के भीतर लंबे समय से चली आ रही गुटबाजी खत्म करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। बैठक में चन्नी और रंधावा की मौजूदगी पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
नई दिल्ली। पंजाब कांग्रेस एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। अगले वर्ष की शुरुआत में संभावित विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच कांग्रेस नेतृत्व संगठनात्मक मजबूती के साथ-साथ अंदरूनी मतभेदों को भी समाप्त करने की कोशिश में जुट गया है। इसी कड़ी में पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल ने 21 जुलाई को दिल्ली में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, कोर कमेटी के चेयरमैन सुखजिंदर सिंह रंधावा तथा चुनाव समितियों से जुड़े प्रमुख नेताओं की बैठक बुलाई है।
कांग्रेस के आधिकारिक एजेंडे में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर विभिन्न चुनाव समितियों के गठन और संगठनात्मक तैयारियों को अंतिम रूप देना शामिल है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बैठक का वास्तविक उद्देश्य पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से चल रही गुटबाजी को कम करना और वरिष्ठ नेताओं के बीच संवाद स्थापित कराना है।
राजा वड़िंग बनाम चन्नी-रंधावा खेमा
पंजाब कांग्रेस पिछले करीब दो वर्षों से नेतृत्व विवाद से जूझ रही है। प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आते रहे हैं। चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा समय-समय पर संगठन की कार्यशैली और नेतृत्व को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
दोनों नेताओं ने पहले सार्वजनिक रूप से राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग भी की थी। इतना ही नहीं, कई मौकों पर उन्होंने उनके साथ मंच साझा करने से भी परहेज किया। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश गया कि पंजाब कांग्रेस कई शक्ति केंद्रों में बंटी हुई है।
दिल्ली नेतृत्व की बढ़ी सक्रियता
हाल के दिनों में कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब की स्थिति को गंभीरता से लिया है। चन्नी और रंधावा की पहले कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला और बाद में संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल से मुलाकात हुई। इन बैठकों के बाद दोनों नेताओं के तेवर अपेक्षाकृत नरम दिखाई दिए हैं।
यही वजह है कि भूपेश बघेल की यह बैठक केवल संगठनात्मक औपचारिकता नहीं बल्कि राजनीतिक 'सुलह बैठक' भी मानी जा रही है।
बैठक में शामिल होना ही होगा बड़ा संदेश
राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा इस बैठक में शामिल होंगे? यदि दोनों नेता बैठक में पहुंचते हैं तो इसे हाईकमान की मध्यस्थता की सफलता माना जाएगा। यदि वे दूरी बनाए रखते हैं तो पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी खत्म होने के दावों पर सवाल उठेंगे। बैठक में साझा तस्वीर और संयुक्त बयान भी कार्यकर्ताओं के लिए सकारात्मक संदेश बन सकते हैं।
चुनाव से पहले एकजुटता कांग्रेस की मजबूरी
पंजाब में कांग्रेस के सामने चुनौती केवल संगठनात्मक नहीं है। राज्य में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा भी अपने-अपने स्तर पर चुनावी रणनीति तैयार कर रहे हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस अंदरूनी संघर्ष में उलझी रहती है तो इसका सीधा नुकसान चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है।
2017 में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाई थी, लेकिन 2022 के चुनाव में उसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद से पार्टी लगातार संगठन को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है।
क्या बदल सकता है बैठक के बाद?
इस बैठक के बाद तीन संभावित संकेत सामने आ सकते हैं। ये हैं- चुनाव समितियों के गठन के साथ सभी गुटों को प्रतिनिधित्व देकर संतुलन बनाने की कोशिश। प्रदेश नेतृत्व और वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय का सार्वजनिक संदेश और विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की एकजुटता दिखाने की रणनीति।
21 जुलाई की दिल्ली बैठक केवल एक संगठनात्मक बैठक नहीं बल्कि पंजाब कांग्रेस की भविष्य की दिशा तय करने वाला राजनीतिक परीक्षण भी है। यदि भूपेश बघेल सभी प्रमुख नेताओं को एक मंच पर लाने में सफल रहते हैं तो कांग्रेस चुनावी तैयारियों में नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ सकती है। लेकिन यदि मतभेद बरकरार रहे तो विपक्ष को कांग्रेस पर हमला करने का नया अवसर मिल जाएगा। इसलिए इस बैठक का सबसे बड़ा एजेंडा चुनाव समिति नहीं, बल्कि विश्वास बहाली और नेतृत्व के बीच सामंजस्य माना जा रहा है।