युवा राष्ट्र की शक्ति और युवतियां संस्कृति और सम्मान की पहचान: आचार्य निर्भयसागर महाराज
वैज्ञानिक संत आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने कहा कि युवा देश, धर्म, समाज और परिवार की सबसे बड़ी शक्ति हैं। युवाओं को जोड़ने से समाज प्रगति करता है, जबकि उन्हें बांटने की प्रवृत्ति समाज को पिछड़ेपन की ओर ले जाती है। उन्होंने युवाओं से संदेह, घृणा और गुटबाजी से दूर रहकर प्रेम, संस्कार और एकता का मार्ग अपनाने का आह्वान किया।
आगरा। जैन भवन, छीपीटोला में बुधवार को आयोजित धर्मसभा में वैज्ञानिक संत आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने युवाओं को राष्ट्र और समाज की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि किसी भी समाज की उन्नति तभी संभव है, जब उसकी युवा शक्ति सही दिशा में कार्य करे। उन्होंने कहा कि प्रत्येक सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक कार्य में युवाओं की सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए, क्योंकि युवा ही भविष्य के निर्माता हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि समाज को जोड़ने की बजाय तोड़ने की प्रवृत्ति घातक है। युवाओं को संदेह, घृणा, नफरत और गुटबाजी जैसी नकारात्मक सोच से दूर रहकर प्रेम, विश्वास और एकता का वातावरण तैयार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जोश के साथ होश भी जरूरी है। किसी भी विषय, व्यक्ति या विचारधारा से बिना समझे शीघ्र प्रभावित होने से बचना चाहिए।
अपने प्रेरक प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा कि यदि युवा देश की आन, मान और भाग्य हैं तो युवतियां उसकी शान, सम्मान, संस्कृति और विधाता हैं। युवा गीत हैं तो युवतियां संगीत हैं। युवा संस्कार हैं तो युवतियां संस्कृति हैं। समाज और राष्ट्र निर्माण में दोनों की समान और महत्वपूर्ण भूमिका है।
आचार्यश्री ने 72 कलाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में ज्ञान, चिंतन, वाणी, संगीत, पाककला, मनोरंजन, साधना, पवित्रता और श्रेष्ठ व्यवहार जैसी अनेक कलाओं का विकास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक दिगंबर साधु इन सभी कलाओं से संपन्न होता है और अपने जीवन से समाज को आदर्श मार्ग दिखाता है।
धर्मसभा से पूर्व आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज का पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट एवं पूजन करने का सौभाग्य एनसीसी मंडल एवं विद्यासागर पाठशाला परिवार को प्राप्त हुआ। श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर आचार्यश्री के मंगल प्रवचन का लाभ उठाया।