अधिवक्ता दीक्षित ने लोकायुक्त के समक्ष विवि में भ्रष्टाचार का परिवाद दर्ज कराया, 30 तक मांगा जवाब
आगरा। शहर के अधिवक्ता डॊ. अरुण दीक्षित ने डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार को लेकर अब लोकायुक्त के यहां परिवाद दर्ज कराया है। लोकायुक्त ने इस परिवाद को स्वीकार करते हुए कुलपति प्रो. आशु रानी समेत विवि के कुल 10 अधिकारियों और प्रोफेसरों से 30 जुलाई 2025 तक शपथ पत्र सहित जवाब मांगा है। शिकायत में रूसा योजना के करोड़ों रुपए में बड़े स्तर पर घोटाले का आरोप लगाया गया है। लोकायुक्त ने इस परिवाद की जांच उप लोकायुक्त को सौंपी है।
रूसा फंड में गड़बड़ियों का आरोप, प्रयोगशालाओं में घटिया उपकरण
डॉ. दीक्षित ने शिकायत में यह कहा है कि रूसा के अंतर्गत प्राप्त करोड़ों रुपए का विवि में दुरुपयोग किया गया है। कई इमारतें केवल फाइलों में बनाकर भुगतान कर दिया गया, जबकि ज़मीनी स्तर पर उनका अस्तित्व ही नहीं है। प्रयोगशालाओं के लिए बिना टेंडर घटिया गुणवत्ता के उपकरण खरीदे गए, जिससे विश्वविद्यालय को वित्तीय नुकसान हुआ।
फर्जी दस्तावेज और राजभवन को गुमराह करने के आरोप
शिकायत में एक प्रोफेसर पर छात्रा के यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। साथ ही यह भी आरोप है कि विश्वविद्यालय द्वारा राजभवन को भेजे गए जवाबों में फर्जी दस्तावेज तैयार कर जवाब दाखिल किया गया। शिकायतकर्ता ने कहा कि शिकायतों के बदले में उन्हीं के खिलाफ कार्रवाई की गई।
इन अधिकारियों पर लगाए हैं आरोप
शिकायत में कुलपति प्रो. आशु रानी, तत्कालीन कुलसचिव राजेश कुमार, प्रो. संजय चौधरी, प्रो. मनु प्रताप सिंह, प्रो. राजीव वर्मा, उप कुलसचिव पवन कुमार, अनूप केशरवानी, परीक्षा नियंत्रक ओमप्रकाश, पीआरओ पूजा सक्सेना और वरिष्ठ सहायक राधिका प्रसाद को आरोपी बनाया गया है।
लोकायुक्त ने मांगी आख्या
लोकायुक्त ने सभी आरोपियों को 30 जुलाई 2025 तक सभी तथ्यों और साक्ष्यों के साथ शपथ पत्र पर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अब देखना यह है कि लोकायुक्त के समक्ष विश्वविद्यालय की ओर से क्या जवाब दाखिल किया जाता है।
30 प्रतिशत कमीशन की मांग का पहले से आरोप
शिकायतकर्ता डॉ. दीक्षित पहले से ही आरोप लगाते आ रहे हैं कि उनके बिल पास कराने के एवज में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा 30 प्रतिशत कमीशन की मांग की गई। उन्होंने कमीशन न देने के चलते 2022 से लगभग साढ़े दस लाख रुपए का भुगतान रोके जाने का आरोप कुलपति पर लगाया है। उन्होंने बताया कि पूर्व में भी तत्कालीन कुलपति प्रो. अशोक मित्तल के कार्यकाल में ऐसा हुआ था, जिसकी शिकायत पर राजभवन द्वारा न्यायमूर्ति की अध्यक्षता में गठित समिति ने जांच कर आरोपों को सही पाया था, जिसके बाद कुलपति को पद छोड़ना पड़ा था।