13 साल का इंतज़ार, फिर ‘एक लाख’ की मांग का आरोप, हंगामा

आगरा के बेसिक शिक्षा विभाग में सोमवार को उस समय हंगामा हो गया, जब 13 वर्षों से गणित-विज्ञान शिक्षक भर्ती का इंतजार कर रहे अभ्यर्थियों में से 10 के नियुक्ति पत्र अचानक रोक दिए गए। अभ्यर्थियों ने विभाग के योगेन्द्र नामक बाबू पर प्रति व्यक्ति एक लाख रुपये मांगने का आरोप लगाया। पैसे न देने पर नियुक्ति पत्र रोकने का आरोप लगाते हुए अभ्यर्थियों ने बीएसए कार्यालय का गेट बंद कर धरना दे दिया। करीब दो घंटे के विरोध प्रदर्शन के बाद अधिकारियों ने सभी रोके गए नियुक्ति पत्र जारी कर दिए।

Mar 24, 2026 - 12:49
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13 साल का इंतज़ार, फिर ‘एक लाख’ की मांग का आरोप, हंगामा
बीएसए कार्यालय में प्रदर्शन करते अभ्यर्थी।

आगरा बीएसए ऑफिस में फूटा अभ्यर्थियों का गुस्सा, हंगामे के बाद जारी हुए नियुक्ति पत्र

आगरा। जनपद आगरा के बेसिक शिक्षा विभाग में सोमवार को उस वक्त माहौल तनावपूर्ण हो गया, जब वर्षों से नियुक्ति की आस लगाए बैठे अभ्यर्थियों का सब्र जवाब दे गया। करीब 13 साल से गणित और विज्ञान शिक्षक भर्ती का इंतजार कर रहे अभ्यर्थियों को जैसे ही राहत की उम्मीद जगी, वैसे ही उन पर कथित रूप से रिश्वतखोरी का साया मंडराने लगा। आरोप है कि नियुक्ति पत्र जारी करने की प्रक्रिया में विभागीय स्तर पर खेल हुआ और इसी के विरोध में अभ्यर्थियों ने बीएसए कार्यालय के बाहर जमकर हंगामा कर दिया।

जानकारी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद लगभग 30 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र मिलने थे। लंबे कानूनी संघर्ष और 13 साल के इंतजार के बाद यह दिन इन अभ्यर्थियों के लिए बेहद अहम था। लेकिन खुशी उस समय गुस्से में बदल गई, जब अचानक 10 अभ्यर्थियों के नियुक्ति पत्रों पर रोक लगा दी गई।

यहीं से पूरे मामले ने तूल पकड़ लिया। अभ्यर्थियों का आरोप है कि विभाग में तैनात योगेन्द्र नामक बाबू ने नियुक्ति पत्र जारी करने के बदले प्रति अभ्यर्थी एक लाख रुपये की मांग की। अभ्यर्थियों के मुताबिक, संबंधित कर्मचारी उन्हें फोन कर अलग से मिलने के लिए बुलाता था और पैसे देने का दबाव बनाता था। जब अभ्यर्थियों ने रकम देने से साफ इनकार कर दिया, तो कथित तौर पर उनके नियुक्ति पत्र रोक दिए गए।

इस कथित वसूली से नाराज अभ्यर्थियों का गुस्सा फूट पड़ा। देखते ही देखते बीएसए कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। अभ्यर्थियों ने कार्यालय का गेट बंद कर दिया और वहीं धरने पर बैठ गए। मौके पर नारेबाजी शुरू हो गई और विभागीय कर्मचारियों में अफरा-तफरी मच गई। कार्यालय परिसर में तनाव का माहौल बन गया और पूरे घटनाक्रम ने बेसिक शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

करीब दो घंटे तक चले हंगामे के बाद अधिकारियों ने स्थिति को संभालने की कोशिश की। जब मामला ज्यादा बढ़ता दिखा और अभ्यर्थियों का दबाव बढ़ा, तो अंततः रोक दिए गए सभी 10 नियुक्ति पत्र भी जारी कर दिए गए। इसके बाद प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों का गुस्सा शांत हुआ और मामला फिलहाल थम गया।

हालांकि, नियुक्ति पत्र जारी होने के बाद भी यह सवाल बरकरार है कि आखिर पहले 10 अभ्यर्थियों के पत्र क्यों रोके गए थे? यदि अभ्यर्थियों के आरोप सही हैं, तो यह मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण बन सकता है।

यह पूरा प्रकरण एक बार फिर बताता है कि नौकरी की लड़ाई सिर्फ अदालतों में नहीं, दफ्तरों की चौखट पर भी लड़नी पड़ रही है। 13 साल की प्रतीक्षा, कोर्ट से राहत, और फिर नियुक्ति पत्र के बदले कथित ‘रकम’ की मांग, इस घटनाक्रम ने शिक्षा विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।