बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफे के बाद निलंबन, धरना और अब सियासी संकेत: अलंकार अग्निहोत्री प्रकरण में अफसरशाही, योगी सरकार और ब्राह्मण राजनीति की खुलती परतें

-रमेश कुमार सिंह- बरेली। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा देने वाले अलंकार अग्निहोत्री को प्रदेश शासन द्वारा निलंबित किए जाने के फैसले ने उत्तर प्रदेश की राजनीति और अफसरशाही, दोनों में हलचल पैदा कर दी है। शासन ने उन्हें शामली के जिलाधिकारी कार्यालय से संबद्ध करते हुए पूरे मामले की जांच बरेली मंडलायुक्त को सौंप दी है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने उनका इस्तीफा फिलहाल स्वीकार नहीं किया, बल्कि अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबन की कार्रवाई की, जिसे राजनीतिक हलकों में एक सुनियोजित रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

Jan 27, 2026 - 16:21
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बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफे के बाद निलंबन, धरना और अब सियासी संकेत: अलंकार अग्निहोत्री प्रकरण में अफसरशाही, योगी सरकार और ब्राह्मण राजनीति की खुलती परतें
बरेली में जिलाधिकारी कार्यालय पर धरना देते निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री। साथ में मौजूद हैं समर्थक।

सिटी मजिस्ट्रेट पद और नौकरी से इस्तीफा देने के बाद अलंकार अग्निहोत्री ने सरकारी आवास बीती रात ही खाली कर दिया था। आज सुबह से ही बरेली में अलंकार अग्निहोत्री चर्चाओं के केंद्र में हैं। इस बीच पता चला है कि अलंकार अग्निहोत्री बरेली कलक्ट्रेट में धरने पर बैठ गये हैं। हालांकि उनके धरने की वजह तो पता नहीं चली है लेकिन माना जा रहा है कि उन्होंने उन आरोपों को लेकर धरना शुरू किया है, जिसमें उन्होंने डीएम पर बंधक बनाने के आरोप लगाये थे।

दरअसल, अलंकार अग्निहोत्री ने जिस अंदाज़ में इस्तीफा दिया और जिस भाषा में प्रशासन व सत्ता पर सवाल उठाए, उससे सरकार को यह आशंका हो गई थी कि यदि इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया, तो वे ‘पीड़ित अफसर’ की छवि के साथ राजनीतिक मंच पर उभर सकते हैं। सरकार नहीं चाहती थी कि वे ‘हीरो‘ के रूप में उभरें। यही वजह मानी जा रही है कि सरकार ने उन्हें इस्तीफा देने का नैरेटिव तय करने का मौका नहीं दिया और पहले ही निलंबन की कार्रवाई कर दी।

इस बीच अलंकार अग्निहोत्री खुद अपने इस्तीफे को राजनीतिक रंग देने में जुटे दिखाई देने लगे हैं। मीडिया से बातचीत में उन्होंने खुलासा किया कि इस्तीफे के बाद से समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और अपना दल सहित कई राजनीतिक दलों की ओर से उनसे संपर्क किया गया है। उनका यह बयान केवल सूचना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत माना जा रहा है कि अग्निहोत्री स्वयं को विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

प्रकरण का सबसे विवादास्पद पहलू वह आरोप है, जिसमें अलंकार अग्निहोत्री ने कहा कि जब वे जिलाधिकारी अविनाश सिंह से मिलने गए, तो उन्हें 45 मिनट तक बंधक बनाकर रखा गया, और बाद में एसएसपी ने उन्हें छुड़वाया। यह आरोप प्रशासनिक व्यवस्था पर सीधा हमला था। हालांकि डीएम अविनाश सिंह ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उस समय उनके आवास पर जिले के सभी एडीएम, एसडीएम, एसएसपी और खुफिया विभाग के अधिकारी मौजूद थे, ऐसे में बंधक बनाए जाने का प्रश्न ही नहीं उठता।

राजनीतिक दृष्टि से यह टकराव केवल एक अफसर और सरकार के बीच का नहीं रह गया है। कई ब्राह्मण संगठनों का खुलकर समर्थन सामने आने के बाद यह मामला स्पष्ट रूप से जातीय राजनीति के दायरे में प्रवेश कर गया है। अलंकार अग्निहोत्री द्वारा बिना नाम लिए योगी सरकार पर ब्राह्मण विरोधी रवैये के आरोप लगाया जाना विपक्ष के लिए एक तैयार नैरेटिव साबित हो सकता है, खासतौर पर उस समय जब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है।

जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार किसी भी सूरत में यह जोखिम नहीं लेना चाहती कि एक निलंबित या इस्तीफा दिया हुआ अफसर विपक्ष का नया चेहरा बन जाए। इसी कारण उनके इस्तीफे को स्वीकार करने के बजाय निलंबन और जांच का रास्ता चुना गया है, ताकि पूरी कहानी सरकारी नियंत्रण में रहे।

विपक्षी दल, विशेषकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, अलंकार अग्निहोत्री द्वारा उठाए गए मुद्दों को हाथोंहाथ ले रहे हैं। प्रशासनिक उत्पीड़न, जातीय असंतुलन और अफसरशाही पर दबाव जैसे विषय पहले से ही विपक्ष के एजेंडे में हैं, और यह प्रकरण उन्हें एक जीवंत उदाहरण उपलब्ध करा रहा है। अलंकार अग्निहोत्री के बहाने विपक्ष को योगी सरकार पर ब्राह्मण विरोधी साबित करने का मौका मिल रहा है।

अब सवाल यह नहीं रह गया है कि अलंकार अग्निहोत्री दोषी हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या यह मामला अफसरशाही बनाम सत्ता का है, या सत्ता बनाम संभावित सियासत का? मंडलायुक्त की जांच रिपोर्ट केवल प्रशासनिक सच्चाई नहीं, बल्कि यह भी तय करेगी कि यह प्रकरण यहीं थमेगा या प्रदेश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत करेगा।

SP_Singh AURGURU Editor