नई सुबह के इंतज़ार में आगराः शहर के समाजसेवी डॉक्टर्स और स्वयंसेवक जिंदाबाद
आगरा शहर अब सिर्फ ताजमहल तक सीमित नहीं, बल्कि बदलाव की मिसाल बनता जा रहा है। स्थानीय डॉक्टर्स, स्वयंसेवकों और नगर निगम की सहभागिता से स्वच्छता, पर्यावरण सुरक्षा और जनजागरूकता की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। "रिवर कनेक्ट" जैसे अभियानों से यमुना के घाट फिर से जीवंत हो रहे हैं, जबकि कुबेरपुर जैसे स्थानों का कायाकल्प बायोरिमेडिएशन तकनीक से हुआ है। आगरा अब उम्मीद, संघर्ष और जनभागीदारी की प्रेरक कहानी बन चुका है, हालांकि चुनौतियां अभी शेष हैं।
-बृज खंडेलवाल-
आगरा, ताजमहल का शहर, अब कचरे के बोझ से नहीं, बल्कि बदलाव की बयार का इंतज़ार कर रहा है। बाबजूद समस्याओं के अंबार के, उम्मीद की किरणें क्षितिज पर दिख रही हैं। राजनीति के अखाड़ेबाजों ने तो पब्लिक को निराश ही किया है, परन्तु छोटी-छोटी कोशिशें आम जनता की भागीदारी और जागरूकता से, बंद दरवाजे खोल रही हैं। लोगों को आशा है कि एक बार मेट्रो रेल प्रोजेक्ट मूर्त रूप ले लेगा, शहर की तमाम समस्याएं सुलझ जाएंगी।
अफसोस, पॉलिटिशियंस ने आगरा की जनता को निराश ही किया है, लेकिन लोकल डॉक्टर्स, आदरणीय डॉ. शरद गुप्ता, डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य, डॉ. हरेंद्र गुप्ता, डॉ. मुनीश्वर गुप्ता, डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ, डॉ. संजय चतुर्वेदी आदि हर मोर्चे पर आगरा के हितों की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं।
आगरा, लंबे समय से अपनी बदहाली के लिए भी चर्चा में रहा है। गलियों में बिखरा कचरा, बदबू मारती नालियां और यमुना के किनारों पर पसरा प्लास्टिक शहर की छवि को धूमिल करता रहा। एक ओर विश्व धरोहर की शान, दूसरी ओर गंदगी का आलम—यह विरोधाभास आगरा की पहचान बन गया था। मगर अब, इस शहर में बदलाव की लहर दौड़ रही है।
यमुना नदी, जो कभी आगरा की आत्मा थी, हाल के वर्षों में गंदे नाले में तब्दील हो चुकी थी। इसके घाटों पर कचरे के ढेर, प्लास्टिक की थैलियां, और धार्मिक चढ़ावे तैरते दिखते थे। मगर रिवर कनेक्ट कैंपेन जैसी पहलों ने इस नदी को फिर से जिंदगी देने का बीड़ा उठाया है। बिना किसी बड़े संसाधन, सिर्फ जज्बे और मेहनत के दम पर, छात्र, पेशेवर, पर्यावरण कार्यकर्ता, और सेवानिवृत्त लोग यमुना के किनारों को साफ करने में जुट रहे हैं। फावड़े और दस्तानों के सहारे वे न सिर्फ कचरा हटा रहे हैं, बल्कि लोगों में नदी के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी का भाव भी जगा रहे हैं।
ये स्वयंसेवक केवल सफाई तक सीमित नहीं हैं। वे कवि गोष्ठियों, कार्यशालाओं, और जागरूकता अभियानों के जरिए नदी को शहर की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में फिर से स्थापित कर रहे हैं। स्कूल, कॉलेज, और यहाँ तक कि धार्मिक गुरु भी इस मुहिम में शामिल हुए हैं। नतीजा? यमुना के किनारे अब फिर से सांस लेने लगे हैं। जहां कभी मलबा और बदबू थी, वहां अब लोग एक नई उम्मीद के साथ इकट्ठा हो रहे हैं।
प्रशासनिक स्तर पर भी आगरा में बदलाव की बयार चल रही है। आगरा नगर निगम के कमिश्नर अंकित खंडेलवाल ने स्वच्छ भारत मिशन को केवल नारा नहीं, बल्कि हकीकत बनाने का संकल्प लिया है। उनके नेतृत्व में कचरा प्रबंधन की व्यवस्था को नए सिरे से डिज़ाइन किया गया है। कचरा संग्रह की आवृत्ति बढ़ाई गई, अवैध डंपिंग पर सख्ती बरती जा रही है और जीपीएस-टैग्ड कचरा वाहनों से जवाबदेही सुनिश्चित की जा रही है। शहरव्यापी ऑडिट ने सफाई के कमजोर बिंदुओं को उजागर किया, जिसके आधार पर लक्षित कार्रवाई शुरू हुई।
सार्वजनिक शौचालयों का कुछ हद तक कायाकल्प हुआ है, धरोहर क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं, और स्कूलों व रेजिडेंट वेलफेयर असोसिएशनों के साथ मिलकर कंपोस्टिंग और रिसाइक्लिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह एक ऐसा बदलाव है जो सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि शहर की बुनियाद को मजबूत करने के लिए है।
आगरा के कायाकल्प की सबसे प्रेरक मिसाल है कुबेरपुर। कभी यह जगह शहर का सबसे बदनाम कचरा-केंद्र थी, जहाँ कचरे के पहाड़ ने ज़मीन और भूजल को ज़हरीला बना दिया था। लेकिन 2019 में शुरू हुई एक महत्वाकांक्षी परियोजना ने इसे बदल डाला। एसपीएएके सुपर इन्फ्रा प्रा. लि. के सहयोग से बायोरिमेडिएशन और बायोमाइनिंग तकनीकों का इस्तेमाल कर कचरे को निपटाया गया। जैविक कचरे को माइक्रोब्स ने विघटित किया, और प्लास्टिक, कांच, और धातुओं को रिसाइकिल किया गया। नतीजा? जहां कभी कचरे का ढेर था, वहां अब एक सोलर-पावर्ड ईको-पार्क खड़ा है।
इस पार्क में देशी पेड़, वॉकिंग ट्रेल्स, और वेस्ट-टू-रिसोर्स डेमो यूनिट्स हैं। यहां स्कूल पिकनिक, पर्यावरण कार्यशालाएं और इको-टूरिज़्म के कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। कुबेरपुर अब गंदगी का पर्याय नहीं, बल्कि पुनर्जनन का प्रतीक बन चुका है। यह दिखाता है कि इच्छाशक्ति और तकनीक के दम पर सबसे बदहाल जगह को भी बदला जा सकता है।
यह बदलाव सिर्फ प्रशासन तक सीमित नहीं है। आगरा की जनता ने भी इस मुहिम को गले लगाया है। कई मोहल्लों ने अपनी गलियों की सफाई की जिम्मेदारी खुद उठाई है। स्वयं सहायता समूह किचन वेस्ट से खाद बना रहे हैं। स्कूलों में "ज़ीरो प्लास्टिक" नियम लागू हो रहे हैं। शहर की दीवारों पर अब स्वच्छता और नागरिक चेतना के संदेश उकेरे जा रहे हैं। यह जनसहभागिता ही आगरा के बदलाव की असली ताकत है।
हालांकि, चुनौतियां अभी भी बाकी हैं। आगरा हर दिन सैकड़ों टन कचरा पैदा करता है। झुग्गी-झोपड़ियों में कचरा निपटान की बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। आवारा पशु और प्लास्टिक कचरा अब भी शहर की सड़कों पर दाग की तरह मौजूद हैं। यमुना की हालत पहले से बेहतर है, लेकिन बिना ट्रीट किया गया सीवेज अब भी उसमें गिर रहा है। इन समस्याओं का समाधान आसान नहीं, लेकिन असंभव भी नहीं।
आगरा का यह कायाकल्प केवल प्रोजेक्ट्स का नतीजा नहीं, बल्कि सोच में आए बदलाव का परिणाम है। "रिवर कनेक्ट" जैसी पहलें पर्यावरण और संस्कृति के संगम का प्रतीक बन रही हैं। कमिश्नर खंडेलवाल के नेतृत्व में नगर निगम ने जनता का भरोसा फिर से जीता है।
आज आगरा सिर्फ ताजमहल का शहर नहीं है। यह एक ऐसे शहर की कहानी है जो अपनी गलतियों से सीख रहा है, अपनी धरोहर को सहेज रहा है, और अपने भविष्य को संवार रहा है। ताजमहल की चमक अब भी आकर्षित करती है, लेकिन आगरा की असली ताकत अब इसके लोगों का हौसला, और स्वयंसेवकों की मेहनत है।