आगरा के शांति वेद हॊस्पिटल का नोएडा के यथार्थ ग्रुप ने 260 करोड़ में किया अधिग्रहण

आगरा में हाईवे पर स्थित शांति वेद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के आखिरकार बिकने की खबर है। ग्रेटर नोएडा के यथार्थ ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स ने इसे 260 करोड़ रुपये में अधिग्रहीत किया है। यह आगरा में किसी भी अस्पताल का अब तक का सबसे बड़ा सौदा है। चमचमाती शानदार इमारत, विश्वस्तरीय उपकरण और प्रशिक्षित स्टाफ के बावजूद अस्पताल नियमित संचालन की चुनौतियों, विभागीय झंझटों, सुविधाशुल्क और सरकारी नीतियों के दबाव में जकड़ने लगा था। नतीजतन आगरा का यह बड़ा प्राइवेट हॊस्पिटल अब बड़े हेल्थ ग्रुप की झोली में चला गया।

Sep 17, 2025 - 12:04
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आगरा के शांति वेद हॊस्पिटल का नोएडा के यथार्थ ग्रुप ने 260 करोड़ में किया अधिग्रहण

-आगरा में किसी भी अस्पताल का यह अब तक का सबसे बड़ा सौदा

-सरकारी नीतियों की जटिलताएं और दबाव बने इस सौदे की वजह

-अब आगरा में भी हेल्थ सेक्टर पर तेजी से छाने लगा इंश्योरेंस कल्चर

कुछ साल पहले शुरू हुआ शांति वेद अस्पताल जल्द ही शहर में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में सफल रहा। 1.65 लाख वर्ग फीट में फैला यह अस्पताल फिलहाल 150 बेड का है, जिसे 250 बेड तक विस्तारित करने की योजना थी। आधुनिक उपकरण और विशेषज्ञ डॉक्टरों के बावजूद संचालन में प्रशासनिक बाधाएं और वित्तीय दबाव लगातार बढ़ते जा रहे थे। Dadoze.com के अनुसार महीनों से इसके बिकने की चर्चा थी, और अब 260 करोड़ में सौदा तय हो गया है।

यथार्थ ग्रुप की आक्रामक एंट्री, यूपी में जमा रहा पैर

हेल्थ केयर सेक्टर का बड़ा नाम यथार्थ ग्रुप दिल्ली-एनसीआर, ग्रेटर नोएडा और फरीदाबाद में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुका है। हाल ही में झांसी और अब आगरा का यह अस्पताल खरीदकर ग्रुप ने उत्तर प्रदेश में अपनी जड़ें और गहरी कर दी हैं। इस सौदे के बाद ग्रुप की क्षमता करीब डेढ़ हजार बेड तक पहुंच जाएगी। खास बात यह है कि इस ग्रुप के प्रमुख ने चिकित्सा शिक्षा आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज से ही हासिल की थी।

एक के बाद एक बिक रहे बड़े अस्पताल

आगरा में यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले हाईवे स्थित अपोलो पंकज अस्पताल, नयति हेल्थ केयर और जीजी हॉस्पिटल भी बड़े बिक चुके हैं। हरीपर्वत क्षेत्र की एक प्रसिद्ध पैथोलॉजी लैब कुछ माह पूर्व मुंबई की कंपनी के हाथों चली गई है। भगवान टाकीज के पास एक अस्पताल लगभग बंद होने के कगार पर है, और उसके बिकने की चर्चाएं तेज हैं।

सिस्टम की बेरहमी और सुविधाशुल्क का बोझ

चिकित्सा जगत के जानकार साफ कहते हैं कि सरकारी नीतियां निजी अस्पतालों का दम घोंट रही हैं। पंजीकरण प्रक्रिया बेहद जटिल है और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, विद्युत सुरक्षा और अग्निशमन विभाग से एनओसी लेना आसान नहीं। प्रस्तावित ढांचे पर मानकों का अनुपालन इतना कठिन है कि सुविधाशुल्क दिए बिना काम आगे नहीं बढ़ता। पंजीकरण मिलने के बाद भी महीनादारी का दबाव खत्म नहीं होता। ऐसे हालात में छोटे अस्पताल तो और भी असहाय हैं, जबकि बड़े अस्पताल भी कॉरपोरेट दिग्गजों की झोली में जाने को मजबूर हो रहे हैं।

निदेशक ने स्वीकारा—तनाव ने किया फैसला लेने को मजबूर

सोशल मीडिया पर अस्पताल के निदेशक एवं सर्जन का बयान वायरल हो रहा है। उसमें साफ कहा गया है कि रोज़मर्रा का प्रबंधन, लाइसेंसिंग मुद्दे, बिलिंग विवाद और प्रशासनिक तनाव उनके मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करने लगे थे। इसलिए उन्होंने यथार्थ ग्रुप से हाथ मिलाने का फैसला किया। निदेशक ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे आगे भी निदेशक और सर्जन के रूप में अपनी भूमिका निभाएंगे, मगर गैर-क्लिनिकल जिम्मेदारियां अब यथार्थ की पेशेवर टीम संभालेगी।

इंश्योरेंस कल्चर का दबदबा और बढ़ेगा

विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े ग्रुप्स के बढ़ते प्रभाव से हेल्थ सेक्टर में इंश्योरेंस कल्चर का दबदबा और बढ़ेगा। इन ग्रुप्स को पता है कि कब, किससे और कैसे निपटना है। स्थानीय विभाग इनके सामने भीगी बिल्ली बन जाते हैं, जबकि स्वतंत्र अस्पतालों को रोज़मर्रा की जद्दोजहद से जूझना पड़ता है।

आगरा का चिकित्सा जगत हतप्रभ

प्रतिष्ठित शांतिवेद इंस्टीटयूट आफ मेडिकल साइंस के 260 करोड़ में अधिग्रहण ने स्थानीय चिकित्सा जगत को हतप्रभ कर दिया है। सबका एक ही सवाल है कि आखिर, ये अस्पताल क्यों बेचना पड़ा? इस स्थिति के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार सिस्टम को बताया जा रहा है। सरकारी विभागों के उसूल और दस्तूर इतने जटिल और उलझाऊ हैं कि अस्पताल संचालन बेहद मुश्किल हो गया है। प्रस्तावित अस्पताल के ढांचागत मानकों का अनुपालन बेहद कठिन है और इसी झंझट से बचने के लिए विभागों द्वारा सुविधाशुल्क वसूला जाता है। अस्पताल प्रबंधन के कई पहलू ऐसे हैं कि एक चिकित्सकीय पेशेवर के लिए इनसे निपटना संभव नहीं हो पाता।

SP_Singh AURGURU Editor