आगरा के एसएन ने किया मेडिकल चमत्कार, पेट से बाहर निकली आंतों वाले 1.4 किलो के नवजात को दी नई जिंदगी

आगरा के एस.एन. मेडिकल कॉलेज ने चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए गैस्ट्रोस्चिसिस से पीड़ित 1.4 किलोग्राम वजन वाले एक गंभीर नवजात को सफल इलाज के बाद नया जीवन दिया है। जन्म के समय बच्चे की आंतें पेट से बाहर थीं और ऑपरेशन के पांचवें दिन ‘पार्शियल बर्स्ट एब्डॉमेन’ जैसी जानलेवा जटिलता भी सामने आई। इसके बावजूद पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के डॉ. राजेश गुप्ता, बाल रोग विभाग के प्रो. राजेश्वर दयाल और एनआईसीयू टीम के संयुक्त प्रयासों से शिशु पूरी तरह स्वस्थ हो गया। तीन महीने बाद बच्चे की स्वस्थ स्थिति ने एसएन मेडिकल कॉलेज की उच्च स्तरीय नियोनेटल केयर और टीमवर्क को नई पहचान दी है।

Mar 28, 2026 - 18:18
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आगरा के एसएन ने किया मेडिकल चमत्कार, पेट से बाहर निकली आंतों वाले 1.4 किलो के नवजात को दी नई जिंदगी
सर्जरी से पहले और दूसरे चित्र में सर्जरी के बाद।

गैस्ट्रोस्चिसिस जैसी जटिल जन्मजात विकृति, फिर ऑपरेशन के बाद ‘बर्स्ट एब्डॉमेन’ जैसी जानलेवा स्थिति, पीडियाट्रिक सर्जरी और एनआईसीयू टीम के समन्वय से 3 महीने बाद पूरी तरह स्वस्थ हुआ मासूम


आगरा। आगरा के चिकित्सा जगत के लिए एक गर्व का क्षण सामने आया है। एस.एन. मेडिकल कॉलेज (SNMC) ने नवजात चिकित्सा और बाल शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में एक ऐसी उपलब्धि दर्ज की है, जिसे मेडिकल चमत्कार कहा जाए तो गलत नहीं होगा। कॉलेज के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग और बाल रोग विभाग (NICU टीम) के संयुक्त प्रयासों से जन्म के समय महज 1.4 किलोग्राम वजन वाले एक गंभीर नवजात को नया जीवन मिला है।

इस नवजात को जन्म से ही गैस्ट्रोस्चिसिस नामक अत्यंत जटिल जन्मजात विकृति थी, जिसमें पेट की दीवार में छेद होने के कारण आंतें शरीर के बाहर आ जाती हैं। ऐसे मामलों में नवजात की जान बचाना अपने आप में बड़ी चुनौती होती है, लेकिन एसएन मेडिकल कॉलेज की टीम ने न सिर्फ सफल सर्जरी की, बल्कि ऑपरेशन के बाद आई जानलेवा जटिलता से भी शिशु को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

जन्म के साथ ही शुरू हो गई जिंदगी की जंग

अस्पताल सूत्रों के अनुसार, जन्म के समय शिशु का वजन केवल 1.4 किलोग्राम था, जो पहले से ही बेहद जोखिम भरी स्थिति मानी जाती है। ऊपर से जन्मजात विकृति के चलते उसकी आंतें पेट से बाहर थीं। शिशु को तत्काल गंभीर अवस्था में एनआईसीयू (NICU) में भर्ती किया गया, जहां डॉक्टरों ने समय गंवाए बिना जीवनरक्षक प्रबंधन शुरू किया। यह मामला इसलिए भी बेहद चुनौतीपूर्ण था क्योंकि इतनी कम उम्र, कम वजन और खुली आंतों की स्थिति में संक्रमण, डिहाइड्रेशन, तापमान असंतुलन और सेप्सिस का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

डॉ. राजेश गुप्ता और टीम ने किया ऑपरेशन

मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. राजेश गुप्ता और उनकी टीम ने तत्काल मोर्चा संभाला। उन्होंने शिशु का Primary Repair किया, यानी बाहर निकली आंतों को सावधानीपूर्वक पेट के भीतर स्थापित कर पेट की दीवार की मरम्मत की गई। इतने कम वजन वाले नवजात में इस प्रकार की सर्जरी करना चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से अत्यंत जटिल माना जाता है। हर कदम पर जोखिम था, लेकिन विशेषज्ञता और अनुभव के बल पर ऑपरेशन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

ऑपरेशन के 5वें दिन आई सबसे बड़ी परीक्षा

सर्जरी के बाद मामला पूरी तरह सामान्य नहीं रहा। ऑपरेशन के पांचवें दिन शिशु का पेट आंशिक रूप से खुल गया, जिसे मेडिकल भाषा में Partial Burst Abdomen कहा जाता है। यह स्थिति नवजात के लिए बेहद खतरनाक और कई बार जानलेवा साबित हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में संक्रमण, आंतों को नुकसान, पोषण की कमी और अचानक बिगड़ती शारीरिक स्थिति का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यही वह मोड़ था, जहां इस केस ने डॉक्टरों की परीक्षा ले ली।

मेडिकल टीम ने दिन-रात एक कर बचाई जान

इस संकट की घड़ी में बाल रोग विभाग के प्रोफेसर राजेश्वर दयाल और उनकी एनआईसीयू टीम ने कमान संभाली। दूसरी ओर डॉ. राजेश गुप्ता के रेजिडेंट डॉक्टरों ने भी लगातार निगरानी, संक्रमण नियंत्रण, पोषण प्रबंधन और पोस्ट-ऑपरेटिव केयर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगातार गहन चिकित्सा, मॉनिटरिंग और विशेषज्ञ देखभाल के चलते शिशु ने धीरे-धीरे इस जानलेवा स्थिति पर विजय पाई। डॉक्टरों की समन्वित रणनीति, समय पर निर्णय और निरंतर देखभाल ने आखिरकार उस मासूम को मौत के मुंह से वापस खींच लिया।

3 महीने बाद पूरी तरह स्वस्थ

अब इस कहानी का सबसे सुखद पहलू यह है कि आज 3 माह का होने पर बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है। फॉलो-अप के दौरान शिशु की सामान्य सक्रियता, बेहतर स्वास्थ्य और स्थिर स्थिति ने पूरी मेडिकल टीम को भावुक कर दिया। जिस बच्चे की जिंदगी जन्म के पहले ही दिन संकट में घिर गई थी, वह आज सामान्य रूप से स्वस्थ है। यह न केवल परिवार के लिए राहत और खुशी की खबर है, बल्कि आगरा के सरकारी चिकित्सा तंत्र के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि है।

एस.एन. मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता ने इस सफलता को संस्थान की चिकित्सा क्षमता का प्रमाण बताते हुए कहा कि यह मामला एस.एन. मेडिकल कॉलेज में दी जा रही उच्च स्तरीय नियोनेटल केयर का प्रत्यक्ष प्रमाण है। 1.4 किलो के वजन वाले बच्चे में ऐसी जटिल जन्मजात विकृति और फिर पोस्ट-ऑपरेटिव जटिलताओं का सफल प्रबंधन हमारे डॉक्टरों की विशेषज्ञता को दर्शाता है। प्रोफेसर राजेश्वर दयाल, डॉ. राजेश गुप्ता और दोनों विभागों के रेजिडेंट डॉक्टरों का आपसी समन्वय वास्तव में सराहनीय है। हमारा संस्थान गरीब और जरूरतमंद मरीजों को जीवन रक्षक सुविधाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

विभागाध्यक्ष सर्जरी एवं वरिष्ठ पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. राजेश गुप्ता ने इस केस को अत्यंत चुनौतीपूर्ण बताते हुए कहा कि गैस्ट्रोस्चिसिस के मामलों में जीवित रहने की दर चुनौतीपूर्ण होती है, विशेषकर जब बच्चा अंडरवेट हो। सर्जरी के बाद एनआईसीयू टीम और हमारे रेजिडेंट्स ने दिन-रात एक कर दिया। प्रोफेसर राजेश्वर दयाल जी के मार्गदर्शन और टीम के अटूट सहयोग से ही हम इस बच्चे को डिस्चार्ज कर पाए। आज फॉलो-अप में बच्चे की सक्रियता देखकर पूरी टीम को आत्मसंतुष्टि मिली है।

आगरा के सरकारी स्वास्थ्य तंत्र के लिए मिसाल बना यह केस

यह केस केवल एक सफल ऑपरेशन भर नहीं है, बल्कि आगरा के सरकारी चिकित्सा ढांचे, विशेषज्ञता, टीमवर्क और आधुनिक नवजात देखभाल की क्षमता का मजबूत उदाहरण है। जिस तरह पीडियाट्रिक सर्जरी, एनआईसीयू, बाल रोग विशेषज्ञों और रेजिडेंट डॉक्टरों ने मिलकर एक लगभग असंभव लगने वाली स्थिति को सफलता में बदला, वह आने वाले समय में शहर के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए प्रेरणादायक मिसाल माना जाएगा।

विशेषज्ञों की मानें तो ऐसे जटिल मामलों का सफल प्रबंधन यह साबित करता है कि अब आगरा जैसे शहरों में भी सरकारी मेडिकल संस्थानों में उच्च स्तरीय सुपर स्पेशियलिटी नवजात चिकित्सा उपलब्ध है।