श्री राधा जी का प्राकट्य: प्रेम, करुणा और भक्ति की अमर गाथा
राधाष्टमी पर आज बरसाना धाम ही नहीं, समूचा ब्रज और पूरा देश भक्ति और उल्लास में डूबा हुआ है। श्री राधा जी बिना कृष्ण की लीला अपूर्ण है। राधा जी प्रेम, करुणा और भक्ति की मूर्ति हैं और उनका जीवन सिखाता है कि ईश्वर तक पहुंचने का सरल मार्ग केवल प्रेम और समर्पण है।
-मोहिनी कृष्ण दासी-
ब्रज की पावन धरा आज भक्ति और उल्लास से सराबोर है। बरसाना धाम में आज तड़के चार बजे श्री राधा जी का प्राकट्य हो चुका है। राधाष्टमी का यह महापर्व हर हृदय को प्रेम, करुणा और भक्ति की अनुभूति करा रहा है।
श्री राधा जी केवल श्रीकृष्ण की प्रिया ही नहीं, बल्कि भक्ति की स्वरूपिणी, प्रेम की पराकाष्ठा और करुणा की मूर्ति हैं। जिस प्रकार जल के बिना कमल नहीं खिल सकता, उसी प्रकार राधा के बिना कृष्ण की लीला अपूर्ण है। राधा और कृष्ण वास्तव में दो नहीं, बल्कि एक ही दिव्य सत्ता के दो रूप हैं- प्रेम और प्रियतम।
श्री राधारानी जी का जीवन सिखाता है कि भक्ति केवल पूजा-पाठ का नाम नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से संपूर्ण समर्पण है। उनका संदेश है कि प्रेम ही ईश्वर तक पहुंचने का सबसे सहज और सरल मार्ग है। भक्ति में न कोई भेद है, न कोई शर्त होती है। सिर्फ हृदय की निर्मलता चाहिए।
श्रीकृष्ण तक पहुंचने का मार्ग श्री राधा जी के नाम से होकर ही जाता है। राधा नाम जपने से मन शुद्ध होता है और जीवन में दिव्य आनंद का अनुभव होता है।
आज संपूर्ण ब्रजभूमि 'राधे-राधे' के गगनभेदी उद्घोष से गूंज रही है। इस राधाष्टमी पर संकल्प लें कि हम अपने जीवन में प्रेम, करुणा और भक्ति को स्थान देंगे। यही राधा जी के प्राकट्य का सच्चा संदेश है।