जल सेवा का तपस्वी: बांकेलाल माहेश्वरी की अमर विरासत और समाजसेवा की कठिन साधना

स्व. बांकेलाल माहेश्वरी ने श्रीनाथ जल सेवा के माध्यम से आगरा में समाज सेवा का जो अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया, वह सिर्फ एक संस्था नहीं बल्कि तपस्या, त्याग और निरंतरता की मिसाल है। धन, श्रम और समय की चुनौती के बीच उन्होंने जो परंपरा शुरू की, वही आज भी समाज को सच्ची सेवा का अर्थ समझाती है।

Aug 28, 2025 - 13:50
 0
जल सेवा का तपस्वी: बांकेलाल माहेश्वरी की अमर विरासत और समाजसेवा की कठिन साधना
स्व. बांके लाल माहेश्वरी।

जन सेवा के क्षेत्र में बांकेलाल माहेश्वरी का अवसान अपूर्ण क्षति है। समाज सेवा कोई साधारण कार्य नहीं, यह एक पीढ़ी से आगे निरंतरता मांगती है, जो विरले ही संभव हो पाती है। जल सेवा के क्षेत्र में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

सेवा का मार्ग आसान नहीं होता। आंधी, बारिश, गर्मी, सर्दी, हर मौसम में जुटना पड़ता है। पैसा, श्रम और सतत प्रयास ही किसी सामाजिक प्रकल्प को सफल बनाते हैं। मैंने 30 वर्षों तक उन्हें निकट से देखा। सुबह-सुबह बर्फ की व्यवस्था करना, राहगीरों को ठंडा पानी पिलाना, रेहड़ी वालों को भुगतान कर व्यवस्था सुचारू रखना और फिर घर जाकर भजन-पूजन करना, यह कोई सामान्य कार्य नहीं था।

हर सेवा के पीछे आर्थिक सहयोग आवश्यक होता है। पहले के समय में सहयोग देने वाले अपने नाम को उजागर नहीं करते थे। श्रीनाथ जी जल सेवा में स्व. लाला पदमचंद ‘डॉक्टर सोप वाले’ और डॉ. एम.सी. गुप्ता जैसे महानुभाव रीढ़ की हड्डी बने, जिन्होंने नाम सामने न रखकर कार्य को आगे बढ़ाया।

मैंने कई बार बांकेलाल जी से आग्रह किया था कि नए लोगों को जोड़ें ताकि यह सेवा 100 वर्ष तक निरंतर चल सके। वे कहा करते थे, सेवा तीन प्रकार की होती है। एक- वे लोग जो धन देकर मंच पर गुनगान चाहते हैं। दूसरे- वे जो शुरुआत में जुड़ते हैं, कुछ समय बाद खुद नया प्रकल्प शुरू कर उसी सेवा को नुकसान पहुंचाते हैं। और तीसरे-  गिने-चुने वे कार्यकर्ता जो तन-मन-धन से जुड़े रहते हैं।

चाहे रैन बसेरा हो या जल सेवा, बांकेलाल जी जीवनपर्यंत इसके लिए समर्पित रहे। उनके बच्चे भी प्रयासरत हैं, पर दूसरा बांकेलाल माहेश्वरी बनना आसान नहीं होगा।

पूर्वजों की प्याऊ, बावड़ी और कुओं के अभाव में जब प्यासे राहगीरों के लिए शुद्ध जल मिलना कठिन था, तब उन्होंने यह सेवा शुरू की। राहगीर अमीर हो या गरीब, पढ़ा-लिखा हो या मजदूर, प्यास बुझाना ही उनका एकमात्र धर्म रहा।

आज मार्च से जून तक तमाम जल सेवाओं की कतार तो दिखती है, पर अधिकतर लोग कुछ वर्षों में ही थम जाते हैं या केवल अखबार में छपने तक ही सीमित रहते हैं। पर बांकेलाल जी ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि सेवा त्याग है, सेवा जुनून है और सेवा अमर है।

प्रभु से प्रार्थना है कि ऐसे सच्चे जनसेवक को अपने श्रीचरणों में स्थान दें। लोकस्वर संस्था और समाज हमेशा उन्हें व उनकी श्रीनाथ जल सेवा को स्मरण करता रहेगा।

-राजीव गुप्ता, जनस्नेही कलम से

लोकस्वर आगरा।

SP_Singh AURGURU Editor