बाले मियां का उर्स और बसंत की बहार, हजरत सलीम चिश्ती की दरगाह वसंत के रंग में सराबोर

हज़रत ताजुद्दीन चिश्ती उर्फ़ बाले मियाँ का उर्स वसंत उत्सव के साथ मनाया गया। हज़रत सलीम चिश्ती की दरगाह सरसों के फूलों, पीले पटकों और सूफ़ियाना संगीत से सजी। संदलपोशी के साथ देश की खुशहाली की दुआ हुई। अमीर ख़ुसरो की बसंत परंपरा को दास्तानगोई और क़व्वाली के ज़रिये जीवंत किया गया, जिसमें हिंदू-मुस्लिम समाज की बड़ी सहभागिता दिखी।

Jan 23, 2026 - 20:08
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बाले मियां  का उर्स और बसंत की बहार, हजरत सलीम चिश्ती की दरगाह वसंत के रंग में सराबोर
हज़रत ताजुद्दीन चिश्ती उर्फ़ बाले मियां के उर्स में शामिल रहमत हज़रत सलीम चिश्ती की दरगाह के सज्जादा नशीन पीरज़ादा अरशद फरीदी व अन्य।

आस्था, संगीत और गंगा-जमुनी तहज़ीब का अनुपम संगम, सरसों के फूल, पीले पटके और अमीर ख़ुसरो की बसंती परंपरा ने बांधा समां

आगरा। हज़रत ताजुद्दीन चिश्ती उर्फ़ बाले मियां  रहमत का उर्स पूरे अकीदत और रूहानियत के साथ मनाया गया। इस अवसर पर हज़रत सलीम चिश्ती की दरगाह वसंत के रंगों में डूबी नजर आई। दरगाह के सज्जादा नशीन पीरज़ादा अरशद फरीदी ने सैकड़ों मुरीदों के साथ बाले मियां की मजार पर संदलपोशी की और देश की खुशहाली, अमन और तरक्की के लिए दुआ की।

इसी दिन से वसंत उत्सव की शुरुआत मानी जाती है, जो देशभर में सात दिनों तक उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। वसंत के इस पावन अवसर पर दरगाह में सरसों के फूल पूरी अकीदत के साथ पेश किए गए। सैकड़ों अकीदतमंद पीले पटके पहनकर बसंत की खुशियों में शामिल हुए। हर तरफ पीले रंग, इत्र की खुशबू और सूफ़ियाना रूहानियत का माहौल रहा।

कार्यक्रम में सूफ़ी क़व्वाल सलीम और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त दास्तानगो सैय्याद साहिल आगा ने अमीर ख़ुसरो की बसंत परंपरा को मौसीक़ाना दास्तानगोई के अंदाज़ में पेश किया। उनकी प्रस्तुति ने बसंत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को जीवंत कर दिया।

इस मौके पर दिल्ली दूरदर्शन की एंकर सादिया अलीम और वरिष्ठ पत्रकार अली आदिल खान की मौजूदगी ने आयोजन की गरिमा बढ़ाई। खास बात यह रही कि हिंदू-मुस्लिम समाज के सैकड़ों लोग एक साथ शामिल हुए, जो गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीवंत मिसाल बना।

अमीर ख़ुसरो द्वारा शुरू की गई ‘बसंत’ की परंपरा भारतीय संस्कृति का अनमोल हिस्सा है। भारतीय सूफियों ने संगीत और कविता के साथ-साथ ऐसे उत्सवों को अपनाकर हिंदू-मुस्लिम संस्कृतियों के बीच सेतु का काम किया और यही परंपरा आज भी दरगाहों में पूरी शिद्दत से निभाई जा रही है।