भीख मांगने वाली हथिनी जारा बनी स्वतंत्रता की मिसाल, मथुरा में पूरे किए पांच साल
मथुरा। कभी तपती सड़कों पर भारी जंजीरों में बंधी हथिनी ज़ारा, आज अपने जीवन के सबसे सुंदर पल जी रही है। वाइल्डलाइफ एसओएस द्वारा कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान बचाई गई ज़ारा ने इस महीने अपने पुनर्वास के पांच साल पूरे कर लिए हैं। पांच साल पहले वह दर्द और क्रूरता से भरी एक ज़िंदगी जी रही थी, लेकिन आज वह मथुरा स्थित हाथी अस्पताल में रिकवरी और केयर की मिसाल बन चुकी है।
भीख से बचाई गई ज़ारा को मिली आजादी
भीख मंगवाने के लिए सड़कों पर घुमाई जाने वाली मादा हथिनी ज़ारा की हालत बदतर थी। ज़ारा को गर्म डामर पर चलने को मजबूर किया जाता था और जब नहीं, तो एक तंग जगह में बांधकर रखा जाता था। उसे ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी गंभीर बीमारी थी और दाहिनी कोहनी का जोड़ भी क्षतिग्रस्त था।
2020 में वाइल्डलाइफ एसओएस ने ज़ारा को रेस्क्यू किया और मथुरा में भारत के पहले हाथी अस्पताल में लाकर उसकी सेहत की देखभाल शुरू की।
पांच साल में ज़ारा की ज़िंदगी में आया बदलाव
शुरुआत में सहमी और डरी हुई ज़ारा को अब दोस्ती, आज़ादी और प्यार की नई दुनिया मिल गई है। उसकी सबसे प्यारी दोस्त है बुज़ुर्ग नेत्रहीन हथिनी आर्या, जिसके साथ वह अक्सर पानी में नहाती है, स्प्रिंकलर के नीचे खड़ी होती है और स्वादिष्ट फलों का आनंद लेती है। उसे सबसे ज़्यादा तरबूज पसंद है। 5वीं वर्षगांठ पर मिला खास फल-केक
ज़ारा की वर्षगांठ पर टीम ने खास सेरिब्रेशन किया। दलिया, चावल और पसंदीदा फलों से बना एक विशेष केक तैयार किया गया जिसे ज़ारा ने बड़े चाव से खाया।
विशेषज्ञों की नज़र में ज़ारा की सफलता
कार्तिक सत्यनारायण, सह-संस्थापक व सीईओ, वाइल्डलाइफ एसओएस ने कहा कि ज़ारा अब पूरी तरह बदल चुकी है। उसका सबसे बड़ा सहारा आर्या के रूप में मिली नई दोस्ती है, जिसे हम हमेशा उसके साथ पाते हैं।
डॉ. इलियाराजा एस, उप निदेशक- पशु चिकित्सा सेवाएं ने बताया कि हम ज़ारा को मानसिक प्रोत्साहन के लिए विशेष उपकरणों जैसे केज फीडर, रोलर्स और पाइप फीडर में खाना देते हैं, जिससे उसका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता है।
गीता शेषमणि, सह-संस्थापक, वाइल्डलाइफ एसओएस ने कहा, शुरुआती डर के बाद ज़ारा ने खुद को खोला और यह साबित किया कि अगर हम करुणा से भरा व्यवहार करें तो सबसे दुखी प्राणी भी विश्वास करें और फलें-फूलें कर सकते हैं।