बंगाल की रणभूमि 2026: टीएमसी और भाजपा के बीच होने जा रहे सीधे मुकाबले में कांग्रेस-वाम दल अस्तित्व की तलाश में, कुछ नये खिलाड़ी भी समीकरण बनायेंगे-बिगाड़ेंगे

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में 2026 का विधानसभा चुनाव केवल सत्ता बचाए रखने और परिवर्तन की कवायद नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व, सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक ताकत की निर्णायक परीक्षा बनता जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस लगातार चौथी बार सत्ता में लौटने का दावा कर रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी इस बार करीबी मुकाबले नहीं बल्कि सीधी जीत की रणनीति के साथ मैदान में उतरने जा रही है। दूसरी ओर कांग्रेस और वाम दल अपने खोए जनाधार को फिर से खोजने की जद्दोजहद में हैं, जबकि आईएसएफ, एआईएमआईएम और हुमायूं कबीर की नई पार्टी अल्पसंख्यक वोटों की राजनीति में नई लकीर खींचने की कोशिश कर रही हैं।

Jan 15, 2026 - 14:13
 0
बंगाल की रणभूमि 2026: टीएमसी और भाजपा के बीच होने जा रहे सीधे मुकाबले में कांग्रेस-वाम दल अस्तित्व की तलाश में, कुछ नये खिलाड़ी भी समीकरण बनायेंगे-बिगाड़ेंगे
AI Image

पश्चिम बंगाल में अभी चुनाव की तिथियां घोषित नहीं हुई हैं, लेकिन प्रायः सभी दल इस समय चुनावी मोड में हैं। दलों की चुनावी तैयारियों के बीच आईपीएसी (इंडियन पॊलिटिकल एक्शन कमेटी) के फाउंडर प्रतीक जैन के ठिकानों पर ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) की रेड से राज्य की राजनीति में बवंडर खड़ा हो गया है। प्रतीक जैन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नजदीकी हैं। उनके ठिकानों पर ईडी की रेड की जानकारी मिली तो ममता बनर्जी स्वयं डीजीपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को लेकर प्रतीक जैन के घर जा पहुंचीं। उन्होंने प्रतीक का मोबाइल अपने हाथ में लिया और हरे रंग की एक फाइल लेकर वहां से निकल आईं। इस दौरान उनके साथ मौजूद अधिकारियों ने ईडी के अधिकारियों को धमकाया, ऐसा आरोप लगाया जा रहा है। 

ममता बनर्जी के इस कदम से हर कोई हैरान है। देश में पहली बार ऐसा हुआ है जब किसी कंपनी के यहां हो रही छापेमारी के दौरान किसी मुख्यमंत्री ने इस तरह दखल दिया हो। यह मामला अब हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर जा पहुंचा है। भाजपा इस मामले को लेकर आक्रामक है और ममता बनर्जी पर लगातार हमले कर यह सवाल पूछ रही है कि प्रतीक जैन के पास ऐसा क्या राज था, जिसके खुल जाने के डर से ममता बनर्जी ईडी के छापे में दखल देने पहुंच गईं और वहां से वह जिस फाइल को लेकर लौटीं हैं, उस फाइल में ऐसा क्या था, जिसकी वजह से ममता यह सब करने को मजबूर हो गईं।

किसी भी मुद्दे को अपने माफिक मोड़ने में माहिर ममता बनर्जी ने ईडी के इस छापे को इस बात से जोड़ दिया है कि प्रतीक जैन की कंपनी में उनकी पार्टी के अहम दस्तावेज और चुनावी रणनीतियां थीं, जिन्हें भाजपा ने ईडी के जरिए चोरी कराया है। पूरी टीएमसी अब इसी को आधार बनाकर भाजपा पर हमलावर है। इन आरोप-पत्यारोपों के चलते सभी दल चुनावी तैयारियों में भी जुटे हुए हैं। एक नजर सभी दलों की स्थिति पर-

टीएमसी: सत्ता का अनुभव और संगठन की ताकत

ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस पिछले डेढ़ दशक से बंगाल की राजनीति की धुरी बनी हुई है। 2021 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी ने पार्टी को यह भरोसा दिया कि उसका जमीनी नेटवर्क, सामाजिक योजनाएं और नेतृत्व का करिश्मा अब भी असरदार है। महिला केंद्रित कल्याणकारी योजनाएं, ग्रामीण पकड़ और बंगाली अस्मिता का नैरेटिव टीएमसी की मुख्य राजनीतिक पूंजी हैं। 2026 में पार्टी का लक्ष्य केवल सत्ता बचाना नहीं, बल्कि यह साबित करना है कि केंद्र की मजबूत भाजपा के बावजूद बंगाल की राजनीति पर उसकी पकड़ कायम है।

भाजपा: संगठन विस्तार और सत्ता का सपना

भाजपा बीते एक दशक में बंगाल में मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी है। 2021 की हार के बाद पार्टी ने नेतृत्व, संगठन और सामाजिक संतुलन पर नए सिरे से काम शुरू किया। 2024 के लोकसभा चुनावों में मिली सफलता ने भाजपा को यह संकेत दिया कि विधानसभा स्तर पर भी उसके लिए अवसर मौजूद हैं। सुवेंदु अधिकारी, सुकांत मजूमदार और शमिक भट्टाचार्य जैसे नेताओं के सहारे पार्टी हिंदुत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और भ्रष्टाचार विरोध को प्रमुख मुद्दा बनाकर टीएमसी को घेरने की तैयारी में है। हालांकि, स्थानीय नेतृत्व और बंगाली पहचान को लेकर भाजपा की चुनौती अब भी बनी हुई है।

कांग्रेस और वाम: अस्तित्व की लड़ाई

कभी बंगाल की राजनीति का केंद्र रहे कांग्रेस और वाम दल आज हाशिये पर खड़े हैं। संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व का अभाव और बदलती सामाजिक संरचना ने इन्हें कमजोर कर दिया है। दोनों दल जानते हैं कि 2026 उनके लिए करो या मरो जैसा चुनाव है। जमीनी आंदोलनों और साझा मोर्चे की कोशिशों के बावजूद यह साफ नहीं है कि वे टीएमसी-भाजपा की ध्रुवीकृत राजनीति के बीच अपनी जगह बना पाएंगे या नहीं।

नए खिलाड़ी: अल्पसंख्यक राजनीति का नया समीकरण

इंडियन सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ) ने युवा मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है। एआईएमआईएम भी सीमित क्षेत्रों में संगठन विस्तार की कोशिश कर रही है। वहीं, हुमायूं कबीर की नई पार्टी अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर सीधे हस्तक्षेप की तैयारी में है। इन दलों की मौजूदगी टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक को चुनौती दे सकती है, लेकिन यह भी तय है कि बिखराव का फायदा अंततः किसे मिलेगा, यह चुनाव परिणाम ही बताएंगे।

जनता की बहस, राजनीति की नब्ज

बंगाल में चुनावी चर्चा केवल मंचों तक सीमित नहीं है। आम लोगों के बीच रोजमर्रा की बहसें इस बात का संकेत देती हैं कि मतदाता इस बार भावनाओं के साथ-साथ शासन, रोजगार और पहचान के सवालों पर भी गंभीरता से सोच रहा है।

2026 का बंगाल चुनाव सत्ता और संगठन, विकास और पहचान, स्थिरता और प्रयोग के बीच टकराव का प्रतीक बनने जा रहा है। टीएमसी-भाजपा की सीधी लड़ाई तय दिखती है, लेकिन छोटे दल और कमजोर पड़ चुके राजनीतिक खिलाड़ी इस चुनाव को अप्रत्याशित मोड़ देने की क्षमता भी रखते हैं। सवाल यही है कि क्या बंगाल पुराने ढर्रे को दोहराएगा या राजनीति में कोई नया अध्याय लिखेगा?

SP_Singh AURGURU Editor