भरतपुर के मोती महल पर अब शाही ध्वज नहीं, युवराज ने स्थापित किया तिरंगा, राजा भी मान गये
भरतपुर। पूर्व भरतपुर रियासत के मोती महल पर शाही झंडा फहराने के ऐलान के बीच जाट समाज में पैदा हुए आक्रोश को रियासत के युवराज अनिरुद्ध सिंह ने राष्ट्रीय ध्वज स्थापित कर शांत कर दिया। ब्रज मंडल की जाट सरदारी ने आज 21 सितंबर को मोती महल पर शाही झंडा फिर से स्थापित करने का ऐलान कर रखा था। इस बीच, युवराज अनिरुद्ध सिंह ने ऐसी चाल चली कि जाट समाज के ऐलान की हवा ही निकल गई। दरअसल युवराज ने 19 सितंबर की रात मोती महल से पचरंगे झंडे को हटाकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहरा दिया। बुझे मन से महाराजा विश्वेंद्र सिंह को तिरंगे को स्वीकार करना पड़ा और इस प्रकार संभावित टकराव टल गया।
पूर्व भरतपुर रियासत के मौजूदा महाराजा विश्वेंद्र सिंह और उनके पुत्र युवराज अनिरुद्ध सिंह के बीच लंबे समय से संपत्ति विवाद और वर्चस्व का मामला चल रहा है। पिछले दिनों युवराज अनिरुद्ध सिंह ने मोती महल पर लम्बे समय से स्थापित शाही झंडे को यह कहते हुए हटा दिया था कि यह झंडा युद्धकाल में लगाया जाता था। इसकी जगह उन्होंने रियासत के ही पचरंगे झंडे को स्थापित कर दिया था। महाराजा विश्वेंद्र सिंह ने शाही झंडे को हटाने का विरोध कर मामला जाट सरदारी के ऊपर डाल दिया था। महाराजा के आह्वान का असर यह हुआ कि आगरा, मथुरा, भरतपुर और हरियाणा क्षेत्र की जाट सरदारी ने मोती महल से शाही झंडा हटाने का विरोध करते हुए उसी ध्वज को पुनः स्थापित करने का ऐलान किया था।
खाप पंचायतों में बहुत गरम था यह मुद्दा
जाट समाज ने जगह-जगह खांप पंचायतें कर युवराज अनिरुद्ध सिंह को सबक सिखाने के साथ 21 सितंबर को मोती महल पर शाही झंडा फहराने का ऐलान किया था। इस विवाद को देखते हुए राजस्थान की भजनलाल सरकार भी सजग थी। सरकार को लग रहा था कि कहीं टकराव के हालात न बन जाएं। इसलिए मोती महल के आसपास भारी संख्या में पुलिस और सशस्त्र बल तैनात कर दिये गये ताकि किसी तरह का खूनी संघर्ष न हो।
महल पर तिरंगा स्थापित होते ही सब कुछ शांत
हालांकि, युवराज अनिरुद्ध सिंह ने 19 सितंबर की रात रणनीतिक कदम उठाते हुए शाही पचरंगे झंडे को हटाकर महल पर तिरंगा स्थापित कर दिया। इस कदम को पूर्व महाराजा विश्वेंद्र सिंह ने भी समर्थन दिया। विश्वेंद्र सिंह ने इसके बाद सोशल मीडिया पर जाट सरदारी के लोगों से अपील की कि 21 सितम्बर को भरतपुर न आएं।
इसके बाद जाट समाज के आक्रोश में भी गिरावट आई और आंदोलनकारी शांत हो गए। जाट संगठनों के नेता भी इस प्रकरण पर कोई बयान देने से बचते दिखे।
महाराजा के फैसले से जाट समाज में नाराजगी-चाहर
अखिल भारतीय जाट महासभा की आगरा जिला यूनिट के अध्यक्ष कप्तान सिंह चाहर ने कहा है कि महाराजा विश्वेंद्र सिंह के इस फैसले से समाज में नाराजगी है। उन्होंने कहा कि महाराजा के आह्वान पर यूपी, राजस्थान, हरियाणा ही नहीं, दूसरे राज्यों के भी जाट समाज के लोग 21 सितम्बर को भरतपुर पहुंचने वाले थे। उन्होंने जिस तरह शाही झंडे को लेकर अपनी पीड़ा व्यक्त की थी, वह समाज को नागवार गुजरा था। रियासत के शाही ध्वज के सम्मान के लिए ही समाज के लोग भरतपुर पहुंचने वाले थे। यही नहीं, महाराजा ने समाज की 21 सदस्यीय समिति को वह शाही ध्वज भी उपलब्ध करा दिया था जो फिर से महल पर स्थापित किया जाना था।
श्री चाहर ने कहा कि प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद महल पर राष्ट्रीय ध्वज स्थापित हो गया। समाज को राष्ट्रीय ध्वज को लेकर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सवाल शाही ध्वज का है, जो भरतपुर रियासत की आन-बान शान है। अचानक महाराजा ने कदम पीछे खींचकर समाज को आहत किया है।