बिना प्लेट-रॉड जानवरों की हड्डी जोड़ने की दिशा में बड़ी सफलता, इंसानों पर भी जल्द होगा प्रयोग

आइवीआरआइ बरेली की वैज्ञानिक डॉ. रेखा पाठक और उनकी टीम ने भैंस के टिश्यू से बना बोन ग्लू तैयार किया है, जो प्लेट-रॉड और स्क्रू के बिना टूटी हड्डियों को जोड़ने में सक्षम है। यह ग्लू 15-25 दिनों में हड्डियों को जोड़कर घाव भी भर देता है। अभी तक यह 10 किलो से कम वजन वाले पशुओं पर सफल रहा है और अब इसका पेटेंट कराया जा रहा है। इंसानों पर उपयोग की दिशा में भी शोध जारी है।

Jul 18, 2025 - 13:52
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बिना प्लेट-रॉड जानवरों की हड्डी जोड़ने की दिशा में बड़ी सफलता, इंसानों पर भी जल्द होगा प्रयोग
आईवीआरआई की प्रधान वैज्ञानिक डॊ. रेखा पाठक और उनके सहयोगी। एक डॊग, जिस पर हड्डी जोड़ने की नई तकनीक का परीक्षण किया गया।

-आईवीआरआई की प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रेखा पाठक की अगुवाई में तैयार हुआ ‘बोन ग्लू’, 

-आरके सिंह-

बरेली। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) इज्जतनगर, बरेली की प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रेखा पाठक ने वर्षों की मेहनत से एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो अब तक पशुओं की टूटी हड्डियों को जोड़ने में क्रांतिकारी साबित हो रही है। यह तकनीक भविष्य में इंसानों के लिए भी वरदान बन सकती है, क्योंकि इस पर भी शोध कार्य तेजी से चल रहा है।

2012 में शुरू हुआ था शोध

इस महत्वपूर्ण शोध की शुरुआत वर्ष 2012 में हुई थी। डॉ. रेखा के निर्देशन में एक रिसर्च टीम ने सबसे पहले भैंस के टिश्यू से बोन ग्राफ्ट (हड्डी के विकल्प) तैयार किया, फिर कोलेजन जैल का निर्माण किया जो घाव जल्दी भरने में सहायक है। तीसरे चरण में इन दोनों को मिलाकर बोन ग्लू तैयार किया गया, जो हड्डी के टुकड़ों को आपस में जोड़ देता है।

कैसे करता है काम बोन ग्लू?

बोन ग्लू को हड्डी के टुकड़ों के बीच भरते समय यह गाढ़ा तरल रूप में रहता है और कुछ समय बाद सख्त होकर परत जैसा बन जाता है। इससे ऑपरेशन के दौरान हड्डी के टुकड़ों को यथास्थान रखकर बाहर और अंदर दोनों तरफ ग्लू भर दिया जाता है। फिर प्लास्टर चढ़ाकर हड्डी को स्थिर किया जाता है।

21 से 25 दिन में जुड़ जाती है हड्डी

शोध में खरगोश, गिनी पिग और कम वज़न के कुत्ते पर इस तकनीक का सफल परीक्षण हो चुका है। इनकी टूटी हड्डियों को बोन ग्लू की मदद से जोड़ दिया गया और 21 से 25 दिनों के भीतर हड्डी पूरी तरह जुड़ गई। प्लास्टर हटने के बाद सभी जानवर सामान्य रूप से चलने लगे।

प्लेट, रॉड, स्क्रू की जरूरत खत्म

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मल्टीपल फ्रैक्चर (हड्डी के कई टुकड़े) में भी अब स्क्रू, प्लेट या रॉड लगाने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे सर्जरी की जटिलता, खर्च और दर्द तीनों से राहत मिलेगी।

इंसानों पर भी हो रहा है प्रयोग

डॉ. रेखा पाठक ने बताया कि अब यह तकनीक इंसानों की हड्डियों पर भी उपयोग करने के लिए एम्स और दो अन्य मेडिकल कॉलेजों के हड्डी रोग विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम किया जा रहा है। इसके अंतिम परिणामों की प्रतीक्षा है।

पेटेंट की तैयारी, जल्द उपलब्ध होगा उपयोग

संस्थान इस तकनीक का पेटेंट कराने की प्रक्रिया में है। पेटेंट मिलने के बाद यह तकनीक देश के अन्य पशु चिकित्सकों के लिए भी उपलब्ध होगी और बड़ी संख्या में पशुओं की जिंदगियां बचाई जा सकेंगी।

जम्मू और जबलपुर में भी परीक्षण सफल

स्थानीय परीक्षण के बाद अब इस तकनीक को जम्मू और जबलपुर के वेटरनरी कॉलेजों में भी आजमाया गया, जहां विभिन्न पशुओं की हड्डियों को सफलतापूर्वक जोड़ा गया है।

वैज्ञानिकों की टीम में युवा शोध छात्र भी शामिल

इस शोध कार्य में युवा शोध छात्र देवेंद्र मंजर सहित कई अन्य लोगों ने भी योगदान दिया। टीम की मेहनत से भारत ने पशु चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई क्रांति का द्वार खोल दिया है।

SP_Singh AURGURU Editor