भाजपा मंडल अध्यक्षः बड़ों में इतनी खीचतान कभी नहीं रही

आगरा/लखनऊ। भाजपा में मंडल अध्यक्ष पद की व्यवस्था शुरू से है। पार्टी में इस पद का महत्व भी बहुत है, लेकिन अब मंडल अध्यक्ष का पद क्षेत्रफल के हिसाब से बहुत बहुत छोटा हो चुका है। दूसरी ओर इस पद के लिए मारामारी पहले से बहुत ज्यादा बढ़ गई है। आगरा जिला और महानगर में खींचतान के चलते दस मंडल अध्यक्षों की घोषणा रोकनी पड़ी है। यूपी भर की बात करें तो 300 से ज्यादा मंडल अध्यक्षों की घोषणा नहीं हो पाई है। वजह यही है कि इस छोटे से पद में बड़े-बड़ों की रुचि है।

Jan 8, 2025 - 20:04
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भाजपा मंडल अध्यक्षः बड़ों में इतनी खीचतान कभी नहीं रही

-आगरा में दस तो यूपी भर में 300 से ज्यादा मंडल अध्यक्षों की घोषणा नहीं हो पाई है

आगरा महानगर जिले को ही लें। इस जिला इकाई में पहले केवल महानगर के तीन विधान सभा क्षेत्र ही आते थे। तब मंडल अध्यक्ष की व्यवस्था विधान सभा क्षेत्र स्तर पर होती थी। दूसरे शब्दों में शहर के तीन विधान सभा क्षेत्रों में तीन ही मंडल अध्यक्ष होते थे। दूसरे दलों में यही पद विधान सभा क्षेत्र अध्यक्ष के नाम से होता है।

समय के साथ महानगर जिला इकाई को तीन से छह मंडलों में विभाजित किया गया। इसके बाद मंडलों की संख्या समय-समय पर बढ़ती रही। आज महानगर के तीन विधान सक्षा क्षेत्र में ही 16 मंडल हैं। पहले संगठन में जो काम तीन मंडल अध्यक्ष देखते थे, अब वह 16 मंडल अध्यक्ष देखते हैं।

दो-ढाई दशक पहले तक मंडल अध्यक्ष का नाम जिला स्तर के वरिष्ठ भाजपा नेता आपस में बातचीत कर तय कर लेते थे। कभी कभार ही ऐसी नौबत आई कि मंडल अध्यक्ष पद के लिए चुनाव कराना पड़ा हो। जिला स्तर पर मंडल अध्यक्षों के नाम तय करके प्रदेश नेतृत्व के पास केवल सूची ही भेजी जाती थी।

बाद में भाजपा में क्षेत्रीय स्तर पर संगठन मंत्री की व्यवस्था लागू होने के बाद भी मंडल अध्यक्षों के नाम जिला स्तर के वरिष्ठ नेता ही तय कर संगठन मंत्री को बता दिया करते थे और वही निर्वाचित घोषित कर दिए जाते थे। कालांतर में जिला स्तर पर पक्षपात और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी होने लगी तो भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने मंडल अध्यक्षों को तय करने का काम भी अपन हाथ में ले लिया। अब चुनाव अधिकारी मंडलों में नामांकन स्वीकार करते हैं। तीन नामों का पैनल क्षेत्रीय कमेटी को भेजा जाता है। क्षेत्रीय कमेटी कोई एक नाम चुनती है और फिर प्रदेश उसी को मंडल अध्यक्ष घोषित कर देता है।

भाजपा में एक समय वह भी था जब अत्यधिक सक्रिय कार्यकर्ता ही मंडल अध्यक्ष बन पाते थे। दावेदारों के बारे में जिले के भाजपा नेता भी अच्छी तरह जानते थे, इसलिए मंडल अध्यक्ष पद तक सक्रिय कार्यकर्ता ही पहुंच पाते थे। पिछले कुछ समय से भाजपा में भी जुगाड़ संस्कृति पनप चुकी है। मंडल अध्यक्ष पद मोहल्ले और अपने क्षेत्र में रुतबा बढ़ाता है, इसलिए सत्ता पक्ष का मंडल अध्यक्ष बनाने के लिए कार्यकर्ता भले ही जमीन पर सक्रिय न हों, सांसदों-विधायकों और अन्य बड़े नेताओं की परिक्रमा कर पद हासिल करने पर अपना फोकस रखते हैं।

SP_Singh AURGURU Editor