पश्चिमी शहरी मॉडल की अंधी नकल ने भारतीय शहरों की आत्मा, सामाजिक जुड़ाव और मिश्रित जीवनशैली को तोड़कर उन्हें दूरी, जाम और अकेलेपन में बदल दिया
भारतीय शहरों की पारंपरिक व्यवस्था, जहां घर और व्यापार साथ-साथ फलते-फूलते थे, सामाजिक और आर्थिक संतुलन की मजबूत नींव हुआ करती थी। पश्चिमी शहरीकरण के प्रभाव में जोनिंग और अलगाव आधारित विकास ने दूरी, ट्रैफिक, प्रदूषण और सामाजिक विखंडन को बढ़ावा दिया। इस परिवर्तन से छोटे व्यापार, मोहल्ला संस्कृति और पारिवारिक निकटता कमजोर हुई, जिससे शहरों की जीवंतता प्रभावित हुई। समाधान उसी मिश्रित और मानवीय शहरी ढांचे में निहित है, जो स्थानीय जरूरतों, संस्कृति और जीवनशैली के अनुरूप हो।
-बृज खंडेलवाल-
यह महज एक तुकबंदी नहीं, बल्कि भारतीय शहरी जीवन का जीवंत दर्शन है। यह उस दौर की गूंज है जब व्यापार और बसेरा एक ही छत के नीचे सांस लेते थे। नीचे दुकान की गहमागहमी, ऊपर घर की शांति, यही हमारे बाजारों की रूह थी। पूरा परिवार व्यापार की ढाल था, समय की बचत थी और सुरक्षा का अभेद्य कवच भी। छोटे-छोटे बच्चे दुकान पर ग्राहकों से बातें सीखते, महिलाएं घरेलू काम के साथ ही व्यापार संभालतीं और बुजुर्ग अनुभव की रोशनी बिखेरते। यह सिर्फ आर्थिक व्यवस्था नहीं थी, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक एकता का सुंदर उदाहरण था।
किंतु आधुनिक शहरीकरण के नाम पर हमने पश्चिम की अंधी नकल में अपनी इस विरासत का गला घोंट दिया। हमने ‘काम’ और ‘रिहाइश’ के बीच ऐसी लकीर खींच दी कि आज शहर ट्रैफिक की जंजीरों में जकड़े हुए हैं। सुबह घर से निकलकर ऑफिस पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। शाम को वापसी में फिर वही थकान और इंतजार। इस दौड़ में परिवार के साथ समय बिताने की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई है।
पश्चिमी मॉडल की देन साफ दिखती है। सड़कों पर रेंगता धुआं और अंतहीन जाम, घंटों की आवाजाही जो खुशियां निगल रही है, और वीरान होते बाजार तथा सूने रिहायशी इलाके जो असुरक्षा को जन्म देते हैं। महिलाएं अकेले घर लौटने में डर महसूस करती हैं। बच्चे खेलने के लिए सुरक्षित जगह नहीं पाते। बुजुर्गों को अकेलापन घेर लेता है।
चांदनी चौक से लेकर आगरा के बेलनगंज, वाराणसी, जयपुर के पुराने शहरों तक, हमारे जैविक शहर नदी किनारे धड़कते दिल की तरह विकसित हुए थे। लोग वहां पैदल चलते, गलियों में रुककर बातें करते और रोजमर्रा की जरूरतें आसानी से पूरी कर लेते। चंडीगढ़ जैसे सेक्टोरल मॉडल ने हमारी सामाजिक बुनावट को खंडित कर दिया है। अब समय आ गया है कि हम फ्रांसीसी नगर-नियोजक ले कोर्बुजिए के थोपे हुए खाकों से बाहर निकलें। हमें आवासीय क्षेत्रों में लघु व्यापार को फिर से जगह देनी होगी। भारत को अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा ; अपनी संस्कृति, अपनी जलवायु, अपनी सामाजिक जरूरतों और अपनी हकीकत के अनुरूप शहर बसाने के लिए।
कभी भारतीय शहर सांस लेते थे। दुकान नीचे होती थी, घर ऊपर। व्यापार और परिवार एक ही छत के नीचे पलते थे। सुबह दुकान की खटखट से दिन खुलता था। दोपहर में चूल्हे की खुशबू फैलती थी। शाम को बच्चों की हंसी, ग्राहकों की मोलभाव, पड़ोसियों की गपशप और कभी-कभी कोई स्थानीय उत्सव ; सब एक साथ बहते थे। शहर नक्शा नहीं था, रिश्ता था। वह रिश्ता मोहल्ले की एकता में, दुकानदार और ग्राहक के विश्वास में और परिवार की निकटता में झलकता था।
अब वह रिश्ता ढीला पड़ गया है। कहीं-कहीं टूट भी गया है। आज का शहर बंटा हुआ है , घर अलग, काम अलग, बाजार कहीं और और बीच में लंबी दूरी। सुबह बच्चे स्कूल बस पकड़ते हैं, पिता घंटों ट्रैफिक में फंसकर ऑफिस पहुंचते हैं और मां अकेले घर संभालती हैं। शाम को जब सब थके-हारे लौटते हैं तो बातचीत की जगह मोबाइल स्क्रीन ले लेती है।
पश्चिमी मॉडल की नकल में शहरों को ‘जोन’ में बांट दिया गया। रिहायश अलग, व्यापार अलग, औद्योगिक क्षेत्र और भी दूर। कागज पर यह साफ-सुथरा लगता है, जमीन पर यह बिखराव बन जाता है। परिणामस्वरूप शहरों में वाहनों की संख्या बढ़ी, प्रदूषण बढ़ा और सामाजिक जुड़ाव कम हुआ।
पहले शहर परतों में बनते थे , धीरे-धीरे, रिश्तों की तरह। अब वे फाइलों में बंटते हैं: सेक्टर, प्लॉट, श्रेणी। जैसे किसी ने जिंदगी को अलमारी में रख दिया हो। मानवीय जरूरतों को नजरअंदाज कर केवल ज्यामिति और नियमों को प्राथमिकता दी जा रही है।
इस बदलाव का सबसे चमकदार चेहरा है मॉल। कांच की दीवारें, एस्केलेटर, ठंडी हवा, एक जैसी दुकानें। सब कुछ व्यवस्थित, सब कुछ आकर्षक। और शायद, सब कुछ थोड़ा अनजाना। इस चमक की कीमत भी है। छोटे दुकानदारों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। वे जो कभी मोहल्ले के अभिन्न अंग थे, आज बड़े-बड़े ब्रांडों के सामने संघर्ष कर रहे हैं।
मोहल्ले का दुकानदार, जो कभी समाज की धुरी था, अब किनारे खड़ा है। उसका छोटा-सा कारोबार उस विशाल, बेनाम बाजार में खो गया है जहां ग्राहक ‘फुटफॉल’ बन जाते हैं और रिश्ता ‘ट्रांजेक्शन’। उसकी दुकान पर जो व्यक्तिगत विश्वास और सलाह मिलती थी, वह अब गायब है।
यह सिर्फ अर्थशास्त्र नहीं, समाजशास्त्र भी है। जब बाजार मोहल्ले से हटता है तो बातचीत भी चली जाती है। जब काम घर से दूर होता है तो परिवार का समय सिकुड़ जाता है। बच्चों के साथ खेलने, बुजुर्गों की देखभाल और पड़ोसियों से जुड़ने के अवसर कम हो जाते हैं। और फिर हम हैरान होते हैं , लोग इतने अकेले क्यों हैं? मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं क्यों बढ़ रही हैं?
हम शहरों को ‘यूजर’ के लिए डिजाइन कर रहे हैं, ‘निवासी’ के लिए नहीं। यूजर केवल उपयोग करता है, निवासी शहर से जुड़ता है, उसे अपनाता है और उसमें योगदान देता है।
यह गलती नई नहीं है, इसकी जड़ें गहरी हैं। 1951 में जब ले कोर्बुजिए भारत आए और चंडीगढ़ का नक्शा बनाया, तो वे सिर्फ इमारतें नहीं बना रहे थे। वे एक सोच ला रहे थे , कि आधुनिकता की एक ही शक्ल है और वह यूरोपीय है।
तत्कालीन नेतृत्व एक नए भारत का सपना देख रहा था : साफ, व्यवस्थित, अतीत से मुक्त। चंडीगढ़ उसी सपने का प्रतीक बना : चौड़ी सड़कें, सटीक सेक्टर, हर चीज अपनी जगह। पर एक सवाल अनसुना रह गया: क्या यह शहर भारतीय जीवन की लय को समझता है?