यूएई ने ओपेक और ओपेक प्लस को छोड़ा, ट्रंप की बड़ी जीत, भारत के लिए राहत
यूएई ने मंगलवार को एक ऐलान के साथ हलचल मचा दी है। उसने ओपेक और ओपेक पल्स समूह को छोड़ने की घोषणा की है। तेल निर्यात करने वाले समूहों के लिए इसे बड़ा झटका माना जा रहा है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए इसे जीत के तौर पर देखा गया है। भारत के लिए यह राहत भरा है।
नई दिल्ली। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने ओपेक और ओपेक प्लस छोड़ दिया है। मंगलवार को उसने यह ऐलान किया। तेल निर्यात करने वाले समूहों और उनके सबसे बड़े लीडर सऊदी अरब के लिए यह बड़ा झटका है। यह ऐसे समय में हुआ है जब ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक संकट पैदा हो गया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिर हो गई है। हालांकि, यूएई का ओपेक से निकलना भारत के लिए अच्छी खबर है। इससे तेल की कीमतों में कमी आने और सप्लाई के नए रास्ते खुलने की पूरी उम्मीद है।
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ओपेक का पुराना मेंबर है। इसका इस तरह अचानक अलग होना समूह में उथल-पुथल मचा सकता है। यह कदम ओपेक और ओपेक प्लस को कमजोर कर सकता है। यह समूह आमतौर पर भू-राजनीति से लेकर उत्पादन कोटे जैसे कई मुद्दों पर आपसी मतभेदों के बावजूद हमेशा एक एकजुट चेहरा दिखाने की कोशिश करता रहा है।
ओपेक के खाड़ी देशों के उत्पादकों को पहले से ही होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते अपना निर्यात करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। यह स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच एक पतला पानी का रास्ता (चोकपॉइंट) है। इससे आम तौर पर दुनिया का पांचवां हिस्सा कच्चा तेल और लिक्विफाइड नैचुरल गैस (एलएनजी) गुजरता है। लेकिन, ईरान की धमकियों और जहाजों पर हमलों के कारण इस रास्ते का इस्तेमाल मुश्किल हो गया है।
हालांकि, ओपेक से यूएई का बाहर निकलना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है। ट्रंप ने इस संगठन पर तेल की कीमतें बढ़ाकर 'बाकी दुनिया को लूटने' का आरोप लगाया है।
ट्रंप ने खाड़ी देशों को मिलने वाली अमेरिकी सैन्य मदद को भी तेल की कीमतों से जोड़ते हुए कहा है कि जहां एक तरफ अमेरिका ओपेक सदस्यों की रक्षा करता है। वहीं दूसरी तरफ वे तेल की ऊंची कीमतें लगाकर इस स्थिति का फायदा उठाते हैं।
यूएई का ओपेक से बाहर निकलना भारत के लिए आर्थिक राहत साबित हो सकता है। कारण है कि उत्पादन की सीमाओं से मुक्त होने के बाद यूएई बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ाएगा। इससे ग्लोबल स्तर पर तेल की कीमतें कम होने की संभावना है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यह उसके लिए न केवल विदेशी मुद्रा की बचत करेगा और महंगाई को कम करने में मदद करेगा, बल्कि यूएई के साथ मजबूत द्विपक्षीय संबंधों के चलते भारत को भविष्य में सस्ता और स्थिर तेल कोटा मिलने की राह भी आसान होगी।