सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया- संविधान से ऊपर कोई नहीं, मंदिर हो या दरगाह, नियम सबके लिए जरूरी
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार 'अराजकता' की छूट नहीं देता; हर मंदिर या दरगाह का एक व्यवस्थित ढांचा और नियम होना अनिवार्य है।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि उसके संचालन के लिए कोई ढांचा न हो और प्रबंधन को लेकर अराजकता की स्थिति नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसी संस्थाओं के कामकाज के लिए एक व्यवस्था एवं नियम होने चाहिए।
सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जज की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की।
हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़ी चिश्ती निजामी परंपरा के वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी की ओर से पेश वकील निजाम पाशा ने कहा कि दरगाह वह स्थान होता है, जहां किसी संत को दफनाया गया हो। इस्लाम में मृत्यु के बाद संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन सूफी आस्था प्रणाली में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है, जहां किसी संत को दफनाया जाता है।
उन्होंने कहा कि भारत में सूफी आस्था प्रणाली में चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदिया और सुहरावर्दिया सहित कई प्रमुख परंपराएं शामिल हैं। मौजूदा मामला चिश्तिया व्यवस्था से जुड़ा है। मेरा कहना है कि यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से एक धार्मिक संप्रदाय है। अगर हजरत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाओं को देखा जाए, तो उनमें रोजा, नमाज, हज, जकात और सबसे बढ़कर आस्था जैसी इस्लामी परंपराओं के पालन पर जोर है।
वकील पाशा ने दलील दी कि किसी धार्मिक संस्था में प्रवेश को विनियमित करने का अधिकार प्रबंधन का हिस्सा है। इस पर जस्टिस अमानुल्ला ने कहा कि प्रबंधन के अधिकार का मतलब ढांचे का अभाव नहीं हो सकता और हर चीज के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए।
जस्टिस अमानुल्ला ने कहा कि अराजकता नहीं हो सकती। चाहे दरगाह हो या मंदिर, संस्था से जुड़े तत्व होंगे, धार्मिक क्रियाओं का एक तरीका होगा और कार्यों के संपादन का क्रम होगा। किसी न किसी को इसे विनियमित करना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई कहे कि मैं जो चाहूंगा, वह करूंगा या द्वार हर समय बिना किसी नियंत्रण के खुले रहें।
उन्होंने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि इसलिए सवाल यह है कि प्रबंधन करने वाला निकाय कौन है। यहीं संरक्षण की बात आती है, क्योंकि विनियमन आवश्यक है। साथ ही, यह संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता। व्यापक संवैधानिक मानकों पर भेदभाव नहीं हो सकता।
जस्टिस अमानुल्ला ने कहा कि हर संस्था के लिए नियम होने चाहिए और इसे प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने हिसाब से तय नहीं कर सकता। इस मामले की सुनवाई जारी है। कोर्ट ने इससे पहले कहा था कि किसी धार्मिक संप्रदाय की किसी प्रथा को आवश्यक या गैर-आवश्यक घोषित करने के लिए मानदंड तय करना न्यायिक मंच के लिए, यदि असंभव नहीं, तो अत्यंत कठिन है।