ऊंची-ऊंची डिग्रियां और छोटे-छोटे मौकों के लिए भी मारामारी! बेरोजगारी ने एमबीए-एमएससी, बीटेक और बीएड युवाओं को होमगार्ड की कतार में खड़ा किया
उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड की तीन दिवसीय होमगार्ड लिखित परीक्षा ने एक चौंकाने वाला सच उजागर किया है। उच्च शिक्षित युवा, जिनके पास एमबीए, बीटेक, एमएससी और बीएड जैसी डिग्रियां हैं, आज बेरोजगारी और पारिवारिक दबाव के चलते होमगार्ड जैसी नौकरी को “संजीवनी” मानने पर मजबूर हो गए हैं।
-आरके सिंह-
बरेली। होमगार्ड भर्ती परीक्षा के दौरान परीक्षा केंद्रों के बाहर, रोडवेज बस स्टैंड और रेलवे स्टेशनों पर जो तस्वीर सामने आई, वह केवल एक परीक्षा की नहीं, बल्कि देश में बढ़ती बेरोजगारी और युवाओं की मजबूरी की मार्मिक कहानी कहती नजर आई।
पीलीभीत के केशव कुमार, जो एमबीए गोल्ड मेडलिस्ट हैं, शनिवार को दूसरी पाली में परीक्षा देकर बाहर निकले तो उनके चेहरे पर उम्मीद से ज्यादा जिम्मेदारियों का बोझ साफ दिखा। उन्होंने बताया कि पढ़ाई के लिए लिया गया एजुकेशन लोन अब सिर पर है और उपयुक्त नौकरी न मिलने के कारण होमगार्ड की नौकरी ही सहारा दिख रही है। कुछ नहीं तो कम से कम लोन तो चुक जाएगा।
बांदा के पास के गांव से आए विपुल भारद्वाज, जिन्होंने एमएससी (एनवायरमेंट) की डिग्री ली है, पिछले तीन वर्षों से नौकरी की तलाश में हैं। वैज्ञानिक बनने का सपना देखने वाले विपुल अब अपने बूढ़े पिता का सहारा बनने के लिए होमगार्ड की वर्दी पहनने को तैयार हैं। बेहतर नौकरी की कोशिश जारी रहेगी, लेकिन फिलहाल घर की जिम्मेदारी जरूरी है, उन्होंने कहा।
तीनों दिन परीक्षा देने आए कई अभ्यर्थी सिविल सेवा की तैयारी कर रहे हैं। उनका मानना है कि होमगार्ड की नौकरी मिलने से कम से कम कोचिंग और जीवनयापन के लिए नियमित आय तो हो जाएगी, जिससे वे अपने बड़े सपनों को जिंदा रख सकेंगे।
हरदोई के होशियार यादव, जो बीएड कर चुके हैं, तीन साल से प्राइवेट स्कूल में मात्र पांच हजार रुपये मासिक वेतन पर पढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि होमगार्ड की नौकरी प्राइवेट नौकरी से बेहतर है। इसके साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर सकूंगा।
हरदोई की रजनी शुक्ला, बी फार्मा की डिग्री धारक, सेना में अधिकारी बनने का सपना देख रही हैं। लेकिन फिलहाल परिवार पर बोझ न बनने के लिए होमगार्ड की नौकरी को जरूरी मानती हैं। वहीं सीतापुर की मनु, जो सिविल सेवा की तैयारी कर रही हैं, पारिवारिक मजबूरियों के चलते कहती हैं कि घर में तुरंत कुछ आय आना जरूरी है, इसलिए नौकरी प्राथमिकता बन गई है।
हरदोई के अंकित सोलंकी ने छह महीने तक 25 हजार रुपये की नौकरी की, लेकिन पारिवारिक कारणों से छोड़नी पड़ी। अब वह होमगार्ड भर्ती परीक्षा में किस्मत आजमा रहे हैं ताकि आगे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी जारी रख सकें।
इसी जिले के नागेंद्र, जिन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय से बीटेक एग्रीकल्चर किया है, आज खेती के साथ-साथ सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि ढंग की नौकरी नहीं मिली, इसलिए हर अवसर को आजमा रहा हूं।
शाहजहांपुर के हरीश पंडित, एमएससी गणित और एलएलबी करने के बाद भी सफलता से दूर हैं। एसआई परीक्षा में असफल रहने के बाद अब वह होमगार्ड भर्ती को एक और मौका मान रहे हैं।
यह पूरी तस्वीर केवल रोजगार की कमी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, जहां उच्च शिक्षा के बावजूद युवाओं को न्यूनतम स्थायित्व के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। होमगार्ड की नौकरी, जो कभी सीमित भूमिका वाली मानी जाती थी, आज लाखों युवाओं के लिए जीवन की संजीवनी बनती जा रही है।