बीएमसी भी हाथ से गई: उद्धव ठाकरे की सियासी भूलें और ‘ब्रांड ठाकरे’ का बिखरता वजूद, चुनाव नतीजे इस बात के संकेत कि ठाकरे परिवार का एकजुट होना भी अब वोट की गारंटी नहीं रहा
कभी महाराष्ट्र की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाली शिवसेना आज सत्ता, संगठन और पहचान, तीनों स्तरों पर कमजोर पड़ चुकी है। भाजपा से नाता तोड़कर कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन करना, हिंदुत्व की मूल विचारधारा से दूरी, एकनाथ शिंदे की बगावत, पार्टी का चुनाव चिह्न गंवाना और बीएमसी चुनाव में राज ठाकरे से गठबंधन जैसे फैसले उद्धव ठाकरे की बड़ी रणनीतिक भूलें रहीं। मराठी बनाम गैर-मराठी मतदाताओं की वास्तविक राजनीति को न समझ पाने और ज़मीनी जुड़ाव कमजोर होने का खामियाजा भी पार्टी को भुगतना पड़ा। इस चुनाव के संकेत स्पष्ट हैं कि केवल राजनीतिक विरासत नहीं, बल्कि स्पष्ट विचारधारा, निर्णायक नेतृत्व और ज़मीनी पकड़ ही राजनीति में सफलता तय करती है।
-एसपी सिंह-
मुंबई। जिस बृहन्मुंबई महानगर पालिका को जीतकर शिवसेना ने पूरे महाराष्ट्र में अपनी राजनीतिक जड़ें मजबूत की थीं, वही दुर्ग अब शिवसेना (उद्धव) के हाथ से फिसल गया है। दशकों तक मुंबई की सत्ता पर काबिज़ रहने वाली शिवसेना, जो कभी केंद्र और राज्य की सत्ता में भाजपा के साथ साझेदार रही, अब न केवल सत्ता से बाहर है बल्कि मुंबई नगर निगम भी गंवा चुकी है। यह सिर्फ एक निकाय की हार नहीं, बल्कि उद्धव ठाकरे की राजनीतिक दिशा, निर्णय क्षमता और रणनीतिक भूलों का परिणाम है।
मुंबई नगर निगम शिवसेना (उद्धव) के लिए आख़िरी सियासी सहारा माना जा रहा था। इसी वजह से उद्धव ठाकरे ने वर्षों पुराने मतभेद भुलाकर अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से हाथ मिलाया। उद्देश्य साफ था- मराठी वोटों का ध्रुवीकरण और भाजपा को रोकना। लेकिन यह फार्मूला भी उल्टा पड़ गया। नतीजों ने साफ कर दिया कि ठाकरे परिवार का एकजुट होना भी अब वोट की गारंटी नहीं रहा। बीएमसी के नतीजों के साथ ही यह सवाल और तेज़ हो गया है कि क्या ‘ब्रांड ठाकरे’ अब भी ज़िंदा है या इतिहास बनता जा रहा है।
शिवसेना की नींव बाला साहब ठाकरे ने रखी थी। उनकी करिश्माई नेतृत्व क्षमता और आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति ने पार्टी को मुंबई से लेकर पूरे महाराष्ट्र में पहचान दी। उत्तराधिकार के सवाल पर बाला साहब ने बेटे उद्धव ठाकरे को आगे बढ़ाया, जबकि भतीजे राज ठाकरे ने अलग राह पकड़ते हुए महाराष्ट्र नव निर्माण सेना बना ली। राज के अलग होने के बावजूद शिवसेना का जनाधार इसलिए नहीं टूटा क्योंकि तब तक बाला साहब पार्टी और विचारधारा के केंद्र में थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में उद्धव को स्थापित कर दिया था।
बाला साहब के बाद राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदला। भाजपा का जनाधार महाराष्ट्र में बढ़ने लगा। पहली बार भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनी तो वर्षों तक ‘बड़े भाई’ की भूमिका निभाने वाली शिवसेना ने मन मसोसकर ‘छोटे भाई’ की भूमिका स्वीकार की। 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला, लेकिन यहीं से उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल शुरू हुई। मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा, जिसे पहले कभी उनका स्वभाव नहीं माना जाता था, अचानक हावी हो गई। पार्टी के भीतर संजय राउत जैसे सलाहकारों के प्रभाव ने इस इच्छा को और हवा दी।
नतीजा यह हुआ कि शिवसेना ने दशकों पुराना भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया और कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली। उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री तो बने, लेकिन यह सत्ता उनकी राजनीतिक पहचान पर भारी पड़ गई। कट्टर हिंदुत्ववादी मानी जाने वाली शिवसेना अचानक ‘धर्मनिरपेक्षता’ का झंडा उठाने लगी। यही वह मोड़ था, जहां से भाजपा और बाद में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना की जड़ों में सेंध लगानी शुरू की। बाला साहब ठाकरे की विचारधारा की याद दिलाकर जनता को बताया गया कि सत्ता के लिए उद्धव ठाकरे ने मूल सिद्धांतों से समझौता कर लिया।
ढाई साल बाद वही हुआ, जिसकी आशंका थी। शिवसेना के ही कद्दावर नेता एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दी और 40 विधायकों को अपने साथ ले गए। भाजपा के समर्थन से शिंदे मुख्यमंत्री बने और उद्धव ठाकरे सत्ता से बाहर हो गए। इसके साथ ही असली शिवसेना की मान्यता भी शिंदे गुट को मिल गई। उद्धव ठाकरे न सिर्फ सत्ता से बाहर हुए, बल्कि पार्टी का चुनाव चिह्न भी गंवा बैठे।
2019 के विधान सभा चुनाव के बाद उद्धव ठाकरे ने देवेंद्र फड़णवीस की कुर्सी खींच ली थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर वायदाखिलाफी के आरोप लगाते हुए भाजपा से नाता तोड़ा था। ठाकरे ने यह कहते हुए ढाई साल का मुख्यमंत्री पद मांगा था कि गृहमंत्री अमित शाह ने इसका वायदा किया था। अमित शाह ने उसी समय उद्धव ठाकरे की इस बात को खारिज कर दिया था। उस समय उद्धव ठाकरे ने जब कांग्रेस और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी से गठजोड़ कर सरकार बनाई तो देवेंद्र फडणवीस और अमित शाह मन मसोस कर रह गये थे। जिन उद्धव ठाकरे ने देवेंद्र फडणवीस और अमित शाह पर वायदाखिलाफी के आरोप लगाये थे, इन्हीं दोनों नेताओं ने ठाकरे के पैरों तले जमीन ही खिसका दी है।
लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन के बेहतर प्रदर्शन ने उम्मीद जगाई कि शिवसेना (उद्धव) का यह गठजोड़ विधानसभा में भी असर दिखाएगा, लेकिन विधानसभा चुनाव में यह भ्रम टूट गया। इसके बाद उद्धव ठाकरे की आख़िरी उम्मीद मुंबई नगर निगम पर टिक गई थी। बीएमसी हार के साथ वह उम्मीद भी समाप्त हो गई।
बीएमसी चुनाव में राज ठाकरे से गठबंधन उद्धव ठाकरे की एक और बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज ठाकरे का नाम मुंबई के गैर-मराठी मतदाताओं में नकारात्मक छवि रखता है। मुंबई के कुल मतदाताओं में लगभग 40 प्रतिशत मराठी और करीब 60 प्रतिशत गैर-मराठी हैं। मराठी मानुष की आक्रामक राजनीति के कारण उत्तर भारत, दक्षिण भारत और गुजरात-राजस्थान मूल के मतदाता राज ठाकरे से दूरी बनाए रखते हैं। उद्धव ने राज से हाथ मिलाकर न सिर्फ गैर-मराठी वोटरों को दूर किया, बल्कि वे मुस्लिम मतदाता भी छिटक गए, जो कांग्रेस-एनसीपी से गठबंधन के बाद शिवसेना (उद्धव) के साथ आए थे।
उद्धव ठाकरे की एक और बड़ी भूल यह रही कि उन्होंने यह मान लिया कि मुंबई का पूरा मराठी वोट उनके और राज ठाकरे के साथ आ जाएगा। जबकि सच्चाई यह है कि मराठी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ भी मजबूती से जुड़ा हुआ है। ज़मीनी हकीकत को समझने में हुई यही चूक बीएमसी में भारी पड़ी।
आज हालात यह हैं कि उद्धव ठाकरे केंद्र और राज्य की सत्ता से बाहर, पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से वंचित और अब मुंबई नगर निगम से भी बाहर होते दिख रहे हैं। बीते पांच-छह वर्षों में बाला साहब ठाकरे की शिवसेना जिस तरह बिखरी है, वह महाराष्ट्र की राजनीति का बड़ा अध्याय बन चुका है। बीएमसी के नतीजे सिर्फ एक चुनाव परिणाम नहीं, बल्कि इस बात का संकेत हैं कि राजनीति में विरासत से ज्यादा निर्णायक होते हैं विचार, स्पष्टता और ज़मीनी जुड़ाव। उद्धव ठाकरे की कहानी अर्श से फर्श तक की वही दास्तान है, जहां गलत फैसलों की कीमत अंततः सत्ता और साख दोनों से चुकानी पड़ती है।