बुलडोज़र एक्शनः राजनीति या जवाबदेही का संकट?

यूपी समेत देश के कई राज्यों में बुलडोज़र कार्रवाई चर्चाओं में है। सवाल उठता है कि अधिकारी अदालत के आदेश से पहले कार्रवाई क्यों नहीं करते और संसद स्पष्ट नियम क्यों नहीं बनाती। जवाबदेही के अभाव में बोझ शीर्ष नेतृत्व पर आ जाता है। इस समस्या का समाधान एक सख़्त, पारदर्शी और सर्वमान्य कानून में ही निहित है।

Jan 9, 2026 - 13:55
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बुलडोज़र एक्शनः राजनीति या जवाबदेही का संकट?
प्रतीकात्मक इमेज।

-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

कभी यहां, कभी वहां। कभी इस शहर, कभी उस शहर, बुलडोज़र एक्शन देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। आम नागरिक हैरान है कि आखिर नियम-कानून कहां रख दिए गए हैं? वर्षों तक जिन अवैध कब्ज़ों पर किसी की नज़र नहीं पड़ी, वे अचानक अदालतों के आदेश के बाद ही क्यों दिखाई देने लगते हैं? सवाल यह भी है कि सरकारी नौकरी में रहते हुए जिम्मेदार अधिकारियों को यह अवैधता पहले क्यों नहीं दिखती?

यह विडंबना ही है कि अधिकांश सरकारी अमला तब तक हरकत में नहीं आता, जब तक हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से आदेश न मिल जाए। क्या अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए अदालत की फटकार अनिवार्य हो गई है? यदि कर्तव्य पालन स्वेच्छा से होता, तो अदालतों पर बोझ भी कम पड़ता और अवैध कब्ज़ों की जड़ समय रहते कट जाती।

देश की संसद (लोकसभा और राज्यसभा) क्या ऐसा सख़्त कानून पारित नहीं कर सकती, जिसमें स्पष्ट हो कि अवैध कब्ज़ों पर कार्रवाई के लिए अदालत के आदेश का इंतज़ार आवश्यक न हो? और जो अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाने में कोताही बरतें, उनके लिए तत्काल दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान क्यों हो? प्रश्न यह भी उठता है कि जनप्रतिनिधि, सांसद, विधायक ऐसे कठोर नियम बनाने से कतराते क्यों हैं? कहीं न कहीं अवैध कब्ज़ों के तंत्र में उनकी मौन सहमति या अप्रत्यक्ष संरक्षण की आशंका भी इन सवालों को जन्म देती है।

जब जिम्मेदार अपना काम नहीं करते, तो उसका बोझ अंततः शीर्ष नेतृत्व पर आ जाता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का उदाहरण सामने है। एक योगी के रूप में वे समता, करुणा और निष्पक्षता के प्रतीक माने जाते हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते प्रशासनिक जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर है, भले ही उपमुख्यमंत्री और पूरा तंत्र मौजूद हो। वे दूसरों की चूक का दायित्व भी स्वयं उठाते आए हैं। ऐसे में उनसे यह अपेक्षा भी की जाती है कि वे या तो बुलडोज़र कार्रवाई पर पूरी तरह विराम लगाएं या फिर बिना भेदभाव के, नियमबद्ध और पारदर्शी तरीके से अपनी जिम्मेदारी अंत तक निभाएं।

दिल्ली, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। जब पहले सब अनदेखा करते रहे, तो अब इन्हीं को समस्या क्यों कहा जा रहा है? यदि संसद से स्पष्ट, कठोर और सर्वमान्य कानून बने, तो न अदालत के आदेश का इंतज़ार करना पड़ेगा और न ही चयनात्मक कार्रवाई के आरोप लगेंगे। तब कोई भी मंत्री, सांसद, विधायक, आईएएस, आईपीएस, नगर निकाय या ग्रामसभा का जिम्मेदार व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकेगा।

असल मुद्दा बुलडोज़र नहीं, बल्कि जवाबदेही है। जब तक संसद से पूरे देश के लिए स्पष्ट नियम नहीं बनते और जिम्मेदारों पर सख़्त कार्रवाई सुनिश्चित नहीं होती, तब तक यह बहस चलती रहेगी और कानून का राज सवालों के घेरे में बना रहेगा।

SP_Singh AURGURU Editor