बाईपास बना, आदेश भी आए… फिर भी आगरा शहर में मौत दौड़ रही!- एनएचएआई पर मानवाधिकार आयोग सख्त, फिर तलब किया स्पष्टीकरण

आगरा। शहर के बीचोंबीच दौड़ रहे गैर गन्तव्य भारी वाहनों पर रोक लगाने के मामले में उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) से स्पष्टीकरण सहित अनुपालन आख्या पुनः तलब कर ली है। आयोग ने इस गंभीर प्रकरण की अगली सुनवाई 17 मई 2026 को नियत करते हुए स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि अब लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

Mar 22, 2026 - 18:48
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बाईपास बना, आदेश भी आए… फिर भी आगरा शहर में मौत दौड़ रही!- एनएचएआई पर मानवाधिकार आयोग सख्त, फिर तलब किया स्पष्टीकरण

दरअसल, आगरा में भारी वाहनों की अनियंत्रित आवाजाही से बढ़ते हादसे, जाम और प्रदूषण के मुद्दे को वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन ने प्रमुखता से उठाया था। इस पर आयोग ने 6 फरवरी 2026 को सुनवाई करते हुए माना था कि राष्ट्रीय राजमार्ग (भूमि एवं यातायात का नियंत्रण) अधिनियम, 2002 की धारा 35 के तहत हाईवे प्रशासन को अधिकार है कि वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध होने पर शहर के भीतर भारी वाहनों के प्रवेश को प्रतिबंधित या नियंत्रित किया जा सकता है।

आयोग ने साफ निर्देश दिए थे कि चूंकि 14 किलोमीटर लंबा उत्तरी बाईपास 4 दिसंबर 2025 से चालू हो चुका है, इसलिए एनएचएआई आवश्यक अधिसूचना जारी कर गैर गन्तव्य भारी वाहनों को इस मार्ग पर डायवर्ट करे। साथ ही 16 मार्च 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया था। लेकिन 17 मार्च की सुनवाई में एनएचएआई रिपोर्ट पेश नहीं कर सका, जिससे आयोग ने नाराजगी जताते हुए दोबारा निर्देश जारी किए और अब 6 मई 2026 तक रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।

हकीकत यह है कि लगभग 400 करोड़ रुपये की लागत से बना उत्तरी बाईपास आज भी अपने उद्देश्य से दूर है। मथुरा और फिरोजाबाद की ओर से आने वाले भारी वाहन अब भी शहर के बीच से गुजर रहे हैं और एनएच-19 पर रोजाना हादसों को न्योता दे रहे हैं। सवाल यह है कि जब समाधान मौजूद है, तो फिर शहर को खतरे में क्यों डाला जा रहा है?

आगरा, जो विश्व धरोहरों का शहर है, वहां यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। उत्तरी बाईपास के आसपास मरियम का मकबरा, अकबर का मकबरा, लोधी टॉम्ब, सलाबत खान का मकबरा और लाल मस्जिद जैसे ऐतिहासिक स्थल, साथ ही स्कूल, अस्पताल और रिहायशी इलाके स्थित हैं। ऐसे में यातायात प्रबंधन की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर पहले ही सख्त निर्देश दे चुका है। 30 दिसंबर 1996 को बाईपास निर्माण के आदेश दिए गए थे और 2012 में भी इसकी निगरानी की गई। दिल्ली में 16 दिसंबर 2015 को बिना लोड-अनलोड वाले भारी वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाकर उदाहरण पेश किया जा चुका है, लेकिन आगरा में हालात अब भी जस के तस बने हुए हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन आंकड़ों का हवाला देकर बताते हैं कि एनएच-19 पर प्रतिदिन 80 हजार से 1.20 लाख वाहन गुजरते हैं, जिनमें 25 से 40 हजार तक भारी वाहन शामिल होते हैं। इनमें से 60-70 प्रतिशत ऐसे वाहन हैं, जिनका आगरा से कोई लेना-देना नहीं होता। यही वाहन शहर के प्रमुख चौराहों सिकंदरा- भगवान टॉकीज, आईएसबीटी, वाटर वर्क्स और रामबाग पर जाम, दुर्घटना और प्रदूषण का कारण बन रहे हैं।

उत्तरी बाईपास से कम वाहनों के गुजरने की बड़ी वजह जागरूकता की कमी और खंदौली टोल प्लाजा पर अतिरिक्त शुल्क बताया जा रहा है। हालांकि यह मार्ग 38 किलोमीटर लंबा, सुरक्षित और बिना रुकावट वाला है, जबकि एनएच-19 का 34 किलोमीटर का रास्ता जाम और खतरे से भरा हुआ है।

के.सी. जैन का कहना है कि जब समाधान मौजूद हो और उसके बावजूद नागरिकों को जोखिम झेलना पड़े, तो यह केवल यातायात का नहीं बल्कि जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार का मामला बन जाता है। उन्होंने मांग की है कि आयोग के आदेशों का सख्ती से पालन हो और उत्तरी बाईपास का वास्तविक उद्देश्य पूरा किया जाए।

अब निगाहें 17 मई 2026 की सुनवाई पर टिकी हैं कि क्या इस बार एनएचएआई जवाब देगा या फिर शहर यूं ही ‘मौत के हाईवे’ पर चलता रहेगा?

SP_Singh AURGURU Editor