जाति जनगणना: सामाजिक न्याय की नई आधारशिला या राजनीतिक समीकरणों की नई बिसात?
नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा जाति आधारित जनगणना को हरी झंडी देना स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ की तरह देखा जा रहा है। यह निर्णय महज आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को नये सिरे से समझने और सुधारने का प्रयास माना जा रहा है। सवाल यह है कि क्या यह कदम वास्तव में सामाजिक न्याय की गहराई तक पहुंचेगा, या आने वाले चुनावी मौसम में यह राजनीतिक हथियार बन जाएगा?
सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम
जाति जनगणना से सरकारों को यह पता चल सकेगा कि कौन सी जातियां आज भी शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी हैं। इससे योजनाएं अधिक लक्षित और प्रभावी बन सकेंगी। अब तक आरक्षण या कल्याणकारी योजनाएं अनुमान और आंशिक आंकड़ों के आधार पर बनाई जाती रही हैं, जिससे कई वंचित तबके लाभ से दूर रह जाते थे।
राजनीतिक समीकरणों पर प्रभाव
इस फैसले के बाद यह लगभग तय है कि जातीय आंकड़े आने के बाद आरक्षण, प्रतिनिधित्व और संसाधनों के बंटवारे को लेकर देश में नई बहस शुरू होगी। यह दलों के वोट बैंक को पुनर्परिभाषित कर सकता है। कुछ वर्गों में सशक्तिकरण की उम्मीद जगेगी, तो कुछ में असुरक्षा की भावना भी बढ़ सकती है। समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल जातिगत जनगणना की मांग उठा रहे थे, लेेकिन बाद में इसे कांग्रेस ने लपक लिया था। आज कैबिनेट ने जातिगत जनगणना का फैसला लेकर भाजपा की ओर से विपक्ष के इस मुद्दे को भी कुंद कर दिया गया है।
संवेदनशीलता और सावधानी जरूरी
जातिगत आंकड़े सामाजिक तनाव का कारण भी बन सकते हैं यदि उनका राजनीतिक इस्तेमाल या तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया। ऐसे में सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी होगी कि वे इस प्रक्रिया को पारदर्शिता और तटस्थता से आगे बढ़ाएं।
जाति जनगणना के आंकड़े जब सामने आएंगे तो केंद्र और राज्य सरकारों पर नीतियों में व्यापक सुधार का दबाव होगा। सामाजिक न्याय के पैमाने फिर से तय होंगे और सत्ता की संरचना में भी संभावित बदलाव दिख सकते हैं।
जाति जनगणना एक आंकड़ा मात्र नहीं, बल्कि यह सामाजिक संतुलन, समावेश और समरसता की नींव बन सकती है बशर्ते इसे ईमानदारी से लागू किया जाए। लेकिन अगर यह सिर्फ एक राजनीतिक कदम बनकर रह गई, तो यह अवसर भी कई अन्य वादों की तरह सिर्फ चुनावी घोषणा बनकर रह जाएगा।