कांग्रेसियों के हंगामे के समय आईसीयू में थे सीईसी के पिता, यह प्रोटेस्ट नहीं, मर्यादा की पराजय है

आगरा में मुख्य चुनाव आयुक्त के माता-पिता के निजी आवास पर पहुंचने के लिए कांग्रेसियों का हंगामा केवल एक घटना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शुचिता पर चोट है। अगर राजनीतिक दल इस तरह अपनी असहमति प्रकट करेंगे तो नागरिक जीवन और लोकतंत्र, दोनों ही असुरक्षित हो जाएंगे। आगरा के कांग्रेसी विजय नगर कॊलोनी के जिस आवास को कोई नया नाम देने जा रहे थे, वह डॊ. सुबोध कुमार के नाम है, जिनके पुत्र हैं सीईसी ज्ञानेश कुमार।

Aug 19, 2025 - 19:51
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कांग्रेसियों के हंगामे के समय आईसीयू में थे सीईसी के पिता, यह प्रोटेस्ट नहीं, मर्यादा की पराजय है

-एसपी सिंह-

आगरा। आगरा में बीते कल यानि सोमवार को जो दृश्य विजय नगर कॉलोनी में देखने को मिला, उसने न केवल कांग्रेस की राजनीति की दिशा पर सवाल उठाए बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा की आत्मा को भी झकझोरा। आगरा शहर कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ताओं ने वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ी के नाम पर विजय नगर कॊलोनी के जिस आवास तक पहुंचने के लिए भारी हंगामा किया, वह देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नहीं बल्कि उनके पिता डॊ. सुबोध कुमार के नाम है। सबसे बड़ी बात कि आगरा में कांग्रेसी जब यह भौंड़ा प्रदर्शन कर रहे थे, उस समय डॊ. सुबोध कुमार दिल्ली के एक अस्पताल के आईसीयू में थे। अगर वे घर पर रहे होते तो इस हंगामे के कारण उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर भी पड़ सकता था।

यह घर मुख्य चुनाव आयुक्त का आधिकारिक आवास नहीं था, बल्कि उनके बुज़ुर्ग पिता डॉ. सुबोध कुमार और माता जी का निजी निवास है। संयोग से सीईसी ज्ञानेश कुमार के माता-पिता उस समय दिल्ली में थे। परिवार से जुड़े सूत्रों ने बताया है कि डॊ. सुबोध कुमार का कोई बड़ा ऒपरेशन हुआ है। सवाल यह है कि जब शिकायत चुनाव आयुक्त से थी, तो यह प्रोटेस्ट दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास के बजाय उनके माता-पिता के निजी आवास पर क्यों करने की कोशिश की गई।

यह डेमोक्रेसी की ताकत नहीं, कमजोरी है

लोकतंत्र हमें विरोध और असहमति का अधिकार देता है। मगर जब यह अधिकार मर्यादा और संवेदनशीलता की सीमा लांघ जाए, तो यह लोकतंत्र की ताकत नहीं, बल्कि उसकी कमजोरी बन जाता है। विजय नगर कॉलोनी में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का आचरण यही दर्शाता है। जानकारी तो यहां तक मिल रही है कि आगरा के कांग्रेसियों ने सीईसी के पिता के आवास पर प्रदर्शन प्रदेश नेतृत्व की अनुमति के बगैर किया।   

यदि बुज़ुर्ग माता-पिता उस क्षण घर में मौजूद होते और उनके साथ कुछ घटना घटती तो क्या कांग्रेस नेतृत्व इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेता? क्या यह वही पॉलिटिकल मोरैलिटी है, जिसकी दुहाई पार्टियां अक्सर देती हैं? 

तो क्या यह सस्ते प्रचार की राजनीति थी

साफ है कि आगरा शहर कांग्रेस नेतृत्व ने यह कदम महज़ सुर्खियां बटोरने और शीर्ष नेतृत्व की नज़रों में अंक जोड़ने के लिए उठाया। शहर अध्यक्ष अमित सिंह और उनके साथियों को तब भी ऐसा करने का अधिकार नहीं था जब यह आवास ज्ञानेश कुमार के नाम होता। उनका विरोध मुख्य चुनाव आयुक्त पद से है, निजी तौर पर ज्ञानेश कुमार प्राइवेट आवास को निशाना नहीं बनाया जा सकता। क्या यह तरीका लोकतांत्रिक असहमति का उचित स्वरूप है, या फिर पब्लिक सेंटिमेंट के साथ खिलवाड़?

विपक्ष की जिम्मेदारी और लीडरशिप क्राइसिस

विपक्ष लोकतंत्र की धुरी होता है, लेकिन विपक्ष का यह रूप चिंता पैदा करता है। सत्ता के विरुद्ध आवाज़ उठाना एक कर्तव्य है, किंतु निजी जीवन की मर्यादा तोड़ना विपक्ष की परिपक्वता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। आगरा शहर कांग्रेस की यह राजनीति कहीं न कहीं लीडरशिप क्राइसिस की ओर इशारा करती है, जहां मुद्दों से ज़्यादा तात्कालिक लोकप्रियता और सस्ता प्रचार प्राथमिकता बन गया है।

SP_Singh AURGURU Editor