सीमाओं से परे संघर्ष का अध्याय: एक दिसंबर 1915 को काबुल में भारत की पहली अंतरिम सरकार बनाने वाले राजा महेंद्र प्रताप सिंह की आज ही जयंती भी है
1 दिसंबर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक स्वर्णिम तिथि है। इसी दिन वर्ष 1915 में काबुल, अफ़गानिस्तान में भारत की पहली अंतरिम सरकार की स्थापना हुई थी। इसके प्रमुख प्रेरणास्रोत, क्रांतिकारी नेता, समाज सुधारक और विश्व मानवता के प्रबल समर्थक राजा महेंद्र प्रताप सिंह के जन्मदिवस भी यही तिथि है। उनकी आत्मकथा में वर्णित यह ऐतिहासिक अध्याय न केवल आज़ादी के संघर्ष का साहसिक संकेत है, बल्कि उनके वैश्विक दृष्टिकोण को भी उजागर करता है।

आत्मकथा का वह अंश, जिसमें राजा महेंद्र प्रताप ने काबुल में गठित भारत की पहली अंतरिम सरकार का ब्यौरा दिया है।
-चोब सिंह वर्मा-
1 दिसंबर, भारतीय इतिहास का वह दिन है जब 1915 में काबुल में भारत की अंतरिम सरकार की स्थापना की गई। एक ऐसी सरकार जिसने भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज़ बुलंद की। इस ऐतिहासिक सरकार के प्रमुख सूत्रधार और वैश्विक मंच पर भारत की स्वतंत्रता को वैचारिक आधार प्रदान करने वाले राजा महेंद्र प्रताप सिंह का आज जन्मदिवस भी है।
राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी आत्मकथा में इस स्थापना दिवस का उल्लेख अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में किया है। वे उस युग के उन चुनिंदा दूरदर्शी नेताओं में से थे, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को सिर्फ राष्ट्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास किया।
यूएनओ का बीज–विचार ‘विश्व संघ’
इतिहास के पन्नों में दर्ज एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह और टोक्यो में स्थित क्रांतिकारी नेता रास बिहारी बोस ( जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई थे) ने मिलकर एक वैश्विक शांति एवं सहयोग संगठन, विश्व संघ का सिद्धांत तैयार किया।
बाद में यही विचार संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) के रूप में विकसित हुआ, जिसे आधुनिक विश्व राजनीति की धुरी माना जाता है।
32 वर्ष विदेशों में रहकर स्वतंत्रता के लिए अभियान
ब्रिटिश शासन के कड़े विरोधी रहे राजा साहब लगभग 32 वर्षों तक विदेशों में प्रवास करते रहे। इस दौरान वे विभिन्न देशों के राजाओं, राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों से मिलकर भारत की आज़ादी के लिए सहयोग और समर्थन जुटाते रहे।
उनकी वैश्विक कूटनीति और अथक संघर्ष का प्रभाव इतना व्यापक था कि 1932 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया गया। किंतु, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने उनकी नागरिकता निरस्त कर दी थी, उन्हें किसी देश का नागरिक नहीं माना गया, इसलिए वे यह सम्मान प्राप्त नहीं कर सके।
कम मिला सम्मान, पर योगदान असीम
राजा महेंद्र प्रताप सिंह न सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि समाज सुधारक, पत्रकार, लेखक, भाषाविद्, दार्शनिक और महान मानवतावादी थे। उनका योगदान महान था, पर जीवनकाल में उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे वास्तविक पात्र थे। आज उनके जन्मदिवस पर देश उन्हें कृतज्ञता, श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण करता है।
(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं)