आगरा में गोल्डन ग्रुप से जुड़े सिटीजन्स बोले: दोपहर की नींद में खलल न डालें मार्केटिंग कॉल्स  

आगरा। ‘ट्रिन-ट्रिन… क्या मेरी बात….. से हो रही है? मैं फलाने बैंक या कंपनी से बोल रहा हूं…’ इस तरह की अनचाही कॉल्स से दिनभर लगभग हर मोबाइल फोनधारी परेशान रहता है। मगर जब ये कॉल्स दोपहर की उस शांत घड़ी में आती हैं, जब वरिष्ठ नागरिक या गृहिणियां कुछ पल आराम करना चाहते हैं, तो ये एक ‘कंकर’ बनकर उनकी थकी हुई दिनचर्या को भंग कर देती हैं।

May 24, 2025 - 11:05
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आगरा में गोल्डन ग्रुप से जुड़े सिटीजन्स बोले: दोपहर की नींद में खलल न डालें मार्केटिंग कॉल्स   

आगरा के वरिष्ठ नागरिकों के समूह ‘गोल्डन एज’ के एक सदस्य ने इसी मुद्दे को लेकर इसी ग्रुप से जुड़े वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता राजीव गुप्ता से अपील की है कि वे इस मुद्दे को उठाएं। उनका कहना है कि 65 वर्ष से ऊपर के बुजुर्गों और गृहिणियों को दोपहर 1:30 बजे से 5:00 बजे तक टेलीमार्केटिंग कॉल्स से राहत मिलनी चाहिए। यह वह समय होता है जब दवा लेकर कुछ देर आराम करने की आवश्यकता होती है और ऐसे समय में फोन की घंटी एक 'साइरन' की तरह महसूस होती है।

राजीव गुप्ता, जो जनसेवा में सक्रिय हैं, ने भी इस समस्या को जायज़ ठहराया और कहा कि टेलीकॉलिंग को लेकर एक व्यवहारिक गाइडलाइन बननी चाहिए, जिसमें आयु, समय और आवश्यकता के अनुसार छूट या नियंत्रण तय किया जा सके। उनका मानना है कि मार्केटिंग के माध्यम से नए उत्पादों की जानकारी तो मिलती है, लेकिन इसका कोई मर्यादित समय होना आवश्यक है। खासकर उन लोगों के लिए जिनकी जीवनशैली अलग और सीमित ऊर्जा की मांग रखती है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन कंपनियों के पास कैसे मोबाइल नंबर, उम्र, प्रोफेशन जैसी निजी जानकारी उपलब्ध होती है। डेटा बिक्री की इस गहराई में उतरना भी जरूरी है, जिससे आम व्यक्ति की निजता और आराम दोनों की रक्षा हो सके।

गोल्डन एज के सदस्यों ने ट्राई और आरबीआई जैसे नियामक निकायों से अपील की है कि वरिष्ठ नागरिकों और गृहिणियों के लिए 'नो-कॉल टाइम' जैसी सुविधा शुरू की जाए। अगर बैंकिंग और विज्ञापन कंपनियां इस विषय में संवेदनशील रवैया अपनाएं, तो यह पहल पूरे देश के करोड़ों परिवारों के जीवन में शांति का एक नया अध्याय खोल सकती है।

SP_Singh AURGURU Editor