मतांतरण: सभ्यता की जड़ों को खोखला करता आधुनिक छल-प्रपंच का सांस्कृतिक षड्यंत्र
भारत की आत्मा सनातन संस्कृति में बसती है। एक ऐसी संस्कृति, जो समय-समय पर आक्रमणों, षड्यंत्रों और भ्रमजालों से संघर्ष करती रही है, परंतु हर बार और प्रबल होकर पुनः खड़ी हुई है। आज फिर से एक नया खतरा हमारे सामने खड़ा है मतांतरण के रूप में। यह खतरा केवल किसी एक धर्म को छोड़कर दूसरे को अपनाने तक सीमित नहीं, बल्कि यह हमारी सामाजिक संरचना, पारिवारिक मूल्य और सांस्कृतिक पहचान को गहराई से खोखला कर रहा है।
-लव जिहाद, डिजिटल जाल, बॉलीवुड-रील्स की साजिश और एकल परिवारों की विघटनकारी प्रवृत्तियों के बीच सनातन समाज को बचाने के लिए जागने की जरूरत
धर्मांतरण दो शब्दों का संयोजन है, ‘धर्म’ और ‘परिवर्तन’। लेकिन जब यह परिवर्तन किसी के स्वाभाविक रुझान से नहीं, बल्कि छल, प्रलोभन या मानसिक दासता के माध्यम से होता है तो वह धर्मांतरण नहीं, बल्कि 'मतांतरण' कहलाता है, धर्म का शोषण करने वाली सुनियोजित साजिश।
सनातन संस्कृति को तोड़ने की आजकल चल रही रणनीति केवल विचार नहीं, यह कृत्रिम प्रेम, आर्थिक लालच, फिल्मी सपने, और परिवारिक विघटन के माध्यम से युवाओं को अपने जाल में फंसाती है। यहां व्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में षड्यंत्रकारी ताकतें सक्रिय हैं, जो केवल मत नहीं बदलतीं, बल्कि समाज की बुनियाद को ही हिला देती हैं।
लव जिहाद: प्रेम के नाम पर पहचान का षड्यंत्र
लव जिहाद आधुनिक मतांतरण का सबसे बड़ा उपकरण बन चुका है। पहले लड़की को फेसबुक, इंस्टाग्राम और शॉर्ट वीडियो ऐप्स पर हीरो टाइप अवतार में फंसाया जाता है। आकर्षक जीवनशैली, उधार की बाइक, ब्रांडेड कपड़े और रील्स में फिल्मी स्टंट दिखाकर उसके कोमल मन को वशीभूत किया जाता है। धीरे-धीरे वह अपनी संस्कृति, माता-पिता की मर्यादा और समाज की सीमाएं तक भूल बैठती है। यही नहीं, प्रेम की आड़ में उस पर दबाव डाल कर या ब्लैकमेलिंग द्वारा मतांतरण तक करवा लिया जाता है।
डिजिटल जाल और वेब सीरीज: संस्कारों के विरुद्ध मायाजाल
बॉलीवुड, ओटीटी प्लेटफॉर्म और इंस्टाग्राम रील्स ने युवाओं को एक ‘मिथ्या ग्लैमर’ की दुनिया में जीने को विवश कर दिया है। इन माध्यमों में एक खास वर्ग की सोच को हीरो बनाकर परोसा जाता है, और उसी वर्ग का चरित्र आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
वेब सीरीज में हीरो अपनी असली पहचान छिपाकर आकर्षण का जाल बुनता है, और फिर लड़की को प्रेम में फंसा कर उसे धर्मांतरित करने तक पहुंच जाता है। सरकार और समाज को न केवल ऐसे कंटेंट का बहिष्कार करना चाहिए, बल्कि कठोर नियंत्रण भी आवश्यक है।
पारिवारिक विघटन: जड़ों से कटती पीढ़ी
80 के दशक के बाद भारत ने जहां आर्थिक प्रगति देखी, वहीं पारिवारिक संरचना में विघटन प्रारंभ हुआ। एकल परिवार, देर रात की पार्टियां, निजी स्वतंत्रता, और मोबाइल फोन, इन सबने बच्चों को संस्कारों की जगह ‘स्वतंत्रता के नाम पर स्वेच्छाचार’ की ओर धकेल दिया।
पहले मोहल्ला, परिवार, स्कूल सभी मिलकर बच्चे के मार्गदर्शक थे। अब रोक-टोक करने वाले रिश्ते खत्म हो गए हैं। इसी अकेलेपन में वे डिजिटल मंचों पर सहारा ढूंढते हैं और वहां से प्रलोभन आधारित मतांतरण की प्रक्रिया शुरू होती है।
गुरु से फादर, आचार्य से सर: शिक्षा का पतन
जहां शिक्षक कभी माता-पिता से भी बड़ा स्थान रखते थे, वहीं आज शिक्षा एक व्यवसाय बन गई है। सरकारी संस्थाएं कम होती गईं, और निजी संस्थानों ने 'कस्टमर-सर्विस' की भावना से शिक्षा देना शुरू कर दिया।
शिक्षकों को न अधिकार रहे, न कर्तव्य का बोध। चरित्र निर्माण, नैतिकता, और व्यवहारिक शिक्षा अब किताबों से नदारद है। यह शिक्षा कभी नशे से बचाव करती थी, अब सिर्फ मार्कशीट और डिग्री तक सीमित रह गई है।
रक्षा कैसे करें? – समाधान के आयाम
पारिवारिक पुनर्गठन: परिवार को फिर से जोड़ें। सामूहिक त्योहार, परंपराएं और बैठकर भोजन की परिपाटी पुनर्जीवित करें।
धार्मिक साक्षरता: बच्चों को मंदिर ले जाएं, धर्माचार्यों से जोड़ें। धर्म को जीवन शैली में समाहित करें।
संयमित तकनीक उपयोग: गैजेट्स और इंटरनेट का सीमित व उपयोगी प्रयोग हो, निगरानी आवश्यक है।
गुरुजन की भूमिका: शिक्षकों को अधिकार दें कि वे बच्चों को मार्ग दिखा सकें। उनके प्रति सामाजिक विश्वास बहाल हो।
मीडिया नियमन: वेब सीरीज, फिल्मों और सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री को सेंसर करें।
सामाजिक परामर्श: समुदाय स्तर पर काउंसिलिंग, संवाद और जागरूकता कार्यक्रम चलें, ताकि लड़कियों और लड़कों दोनों को सही दिशा मिल सके।
निष्कर्ष: मतांतरण नहीं, सांस्कृतिक विनाश है यह
मतांतरण केवल धर्म परिवर्तन नहीं, यह सांस्कृतिक हत्या है। यह हमारे पूर्वजों की तपस्या, संस्कार और पहचान को खत्म करने का प्रयास है। यह धीमा ज़हर है जो पीढ़ियों को अपनी जड़ों से काट कर एक दिशाहीन भविष्य की ओर धकेल रहा है।
आज आवश्यकता है कि हम अपने परिवार, धर्म, समाज और मूल्यों की रक्षा करें। यह समय भावनात्मक नहीं, सांस्कृतिक युद्ध का है, जहां शस्त्र नहीं, संस्कार हथियार हैं।
बच्चों को प्रेम करें, उन पर भरोसा करें लेकिन आंख मूंदकर नहीं। उन्हें सतर्क करें, मार्गदर्शन दें। समाज और राष्ट्र को सुरक्षित रखने का मार्ग बेटी-बेटे की सुरक्षा से होकर ही गुजरता है।
-राजीव गुप्ता, जनस्नेही कलम से
लोकस्वर, आगरा।