मंदिरों की चौखट पर भ्रष्टाचार: तिरुपति से तिरुमाला तक भगवान के नाम पर लूट और पाप का संगठित धंधा, व्यवस्था कटघरे में
तिरुपति और तिरुमाला में सामने आए घोटालों ने मंदिर परिसरों में फैलते भ्रष्टाचार को उजागर कर दिया है। मिलावटी प्रसाद, नकली चढ़ावे और री-साइक्लिंग के नाम पर आस्था का शोषण हो रहा है। यह खतरा हिंदुत्व को नहीं, बल्कि आस्था की आत्मा को है। सरकार, प्रशासन और समाज, तीनों को मिलकर मंदिरों की पवित्रता बचानी होगी।
-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-
आज तिरुपति और तिरुमाला केवल भक्ति और श्रद्धा के कारण ही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और अनैतिक कृत्यों के चलते भी सुर्खियों में हैं। तिरुपति मंदिर में प्रसाद के लिए इस्तेमाल होने वाले घी में मिलावट की पुष्टि के बाद एसआईटी जांच के आदेश दिए जा चुके हैं। वहीं केरल के एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिंदू धार्मिक स्थल तिरुमाला में मंदिर के सोने के बने पट्ट तांबे से बदले जाने का मामला सामने आया है, जिस पर भी जांच और एसआईटी गठित करने के निर्देश जारी हुए हैं।
हिंदू या हिंदुत्व किसी खतरे में नहीं हैं, न ही आस्था डगमगाई है, लेकिन ऐसे प्रकरण मन को खिन्न अवश्य कर देते हैं। कुछ वर्ष पूर्व एक बड़े मंदिर के महंत ने इलाज के दौरान अपनी पीड़ा साझा की थी। उनका कहना था कि मंदिरों में चढ़ने वाला दूध, पेड़ा, लड्डू, सब कुछ मिलावट की चपेट में है। यहां तक कि शनिदेव को अर्पित किया जाने वाला तेल भी नकली और मिलावटी हो चुका है। शनिदेव के दंड का भय, जो कभी लोगों की अंतरात्मा को नियंत्रित करता था, अब लगभग समाप्त हो चुका है।
महंत ने यह भी बताया कि श्रद्धालुओं द्वारा मंदिरों में नकली सिक्के, नकली नोट और फटे-पुराने, कहीं भी न चलने वाले नोट चढ़ा दिए जाते हैं, और ऐसा करते समय किसी को आत्मग्लानि तक नहीं होती। प्रश्न उठता है कि क्या कुछ लोगों की अंतरात्मा पूरी तरह कुंठित हो चुकी है? भक्ति आखिर कहां भटक गई?
एक और गंभीर समस्या है- री-साइक्लिंग की आड़ में लूट। मंदिरों में चढ़ाए गए नारियल, फल, फूल और प्रसाद घूम-फिरकर बाहर दुकानों पर दोबारा बिकते हैं। यह भक्ति नहीं, बल्कि श्रद्धा के साथ किया गया छल है। ऐसे लोग न केवल स्वयं गिरते हैं, बल्कि समाज को भी अपने रंग में रंग देते हैं। आज धनबल के आगे नैतिकता बौनी होती जा रही है, चाहे उस व्यक्ति पर कितने ही मुकदमे क्यों न हों।
पाप और प्रायश्चित का भी बाज़ारीकरण हो चुका है। आधे घंटे की पूजा और कुछ सौ या हज़ार रुपये में पाप-हरण पैकेज उपलब्ध हैं। पहले पाप करो, फिर शुद्ध हो जाओ और फिर अगले पाप के लिए तैयार। यही क्रम बनता जा रहा है। कभी अनजाने में चींटी मार देने को भी पाप मानने वाला समाज आज बड़े-बड़े पाप हंसते हुए कर रहा है।
भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं। सरकार का दायित्व बनता है कि मंदिरों और उनके परिसरों में व्यवस्थागत सुधार शुरू हों। महंत बताते थे कि पुलिस और सरकारी अमला मौजूद रहता है, फिर भी नकली दूध, नकली तेल और मिलावटी प्रसाद खुलेआम चढ़ रहा है। यदि निगरानी में यह सब हो रहा है, तो जिम्मेदारों से जवाबदेही क्यों नहीं तय होती? जो अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर पा रहे, उन्हें पद पर बनाए रखने का औचित्य क्या है?
हिंदुत्व तब तक जीवित है, जब तक आस्था जीवित है। आस्था से खिलवाड़ को रोका जाना चाहिए। श्रद्धालु मंदिर तक सहज पहुंचे, दलालों और लपकों से बचे, और उनकी भक्ति का अपमान न हो, यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। वरना वह दिन दूर नहीं, जब आस्था से उचटे लोग अन्य धर्मों की ओर झुकने लगें।
महंतों ने अपने स्तर पर प्रयास किए, लेकिन अब यह समस्या किसी एक व्यक्ति के बूते की नहीं रही। प्रशासन, समाज और व्यवस्था, तीनों को एक साथ जिम्मेदारी निभानी होगी। तिरुपति और तिरुमाला में यदि यह स्थिति है, तो शेष देश के मंदिरों की दशा का अनुमान लगाना कठिन नहीं।