देवउठनी एकादशीः चातुर्मास की योगनिद्रा से आज जागेंगे भगवान विष्णु, शुरू हो जाएंगे मांगलिक कार्य

आज देवउठनी एकादशी है। यह भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है जो श्रद्धा, समर्पण और नवजीवन का प्रतीक है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि अंतरात्मा के जागरण का संदेश है। इस दिन का उद्देश्य मनुष्य के भीतर सुप्त पड़ी आध्यात्मिकता को जगाना है। यह पर्व सिखाता है कि जैसे भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागकर सृष्टि में पुनः जीवन का संचार करते हैं, वैसे ही प्रत्येक मनुष्य को भी अपने कर्म, श्रद्धा और धर्म के मार्ग पर पुनः जागृत होना चाहिए।

Nov 1, 2025 - 12:08
Nov 1, 2025 - 12:30
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देवउठनी एकादशीः चातुर्मास की योगनिद्रा से आज जागेंगे भगवान विष्णु, शुरू हो जाएंगे मांगलिक कार्य

कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानि प्रबोधिनी एकादशी को श्री विष्णु जी के योगनिद्रा से जागने के साथ ही चार महीने से रुके हुए मांगलिक और शुभ कार्यों के फुर से शुभारंभ की घड़ी आ गई है। आज देवउठनी एकादशी के साथ शुभ कार्यों का सिलसिला शुरू हो जाएगा। हालांकि शादियों का पहला मुहूर्त 21 नवंबर का है, इसलिए शहनाई बजने का सिलसिल तीन हफ्ते बाद ही शुरू हो सकेगा।  

सनातन धर्म में कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाने वाला देवउठनी एकादशी वर्ष के सबसे पवित्र पर्वों में एक है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं, जिससे ब्रह्मांड में पुनः शुभता और मंगल कार्यों का आरंभ माना जाता है। यह वही तिथि होती है, जब चातुर्मास का समापन होता है और विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत, मुंडन आदि शुभ कार्यों की शुरुआत की जाती है।

दैवज्ञ पं. बृज मोहन दीक्षित बताते हैं, कार्तिक शुक्ल पक्ष की 11वीं तिथि को ही देव उत्थान एकादशी, प्रबोधिनी एकादशी और देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इस बार यह आज (एक नवंबर 2025) को मनाई जा रही है। इसी दिन से चातुर्मास से रुके हुए सभी तरह के मांगलिक कार्यों का शुभारंभ होने जा रहा है। जैसे विवाह, गृह प्रवेश, जनेऊ संस्कार, नूतन गृहारम्भ आदि।

उन्होंने बताया कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी (हरिशयनी एकादशी) के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जगते हैं। मान्यता है कि इन चार महीनों के दौरान यानी चातुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ जैसे सभी मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं। जब श्री विष्णु जागते हैं, तब देवी-देवता पुनः अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त होते हैं और संसार में शुभ काल की शुरुआत होती है।

दैवज्ञ पं. बृज मोहन दीक्षित ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा को भीष्म पंचक समाप्त होते हैं और कार्तिक स्नान, दीपदान, चातुर्मास अनुष्ठान की समाप्ति पर यह मास पूर्ण होता है। उन्होंने बताया कि दो नवंबर को तुलसी विवाह रहेगा जो विवाह नक्षत्र के आधार पर 2 से 5 नवंबर के मध्य भी कर सकते हैं।

देवोत्थान एकादशी के शुभ मुहूर्त

तिथि प्रारंभ: 1 नवंबर 2025 (शनिवार) सुबह 10:06 बजे से।

तिथि समाप्त: 2 नवंबर 2025 (रविवार) सुबह 08:42 बजे तक।

व्रत पारण का समय: 2 नवंबर प्रातः 08:45 बजे के बाद।

पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय: 1 नवंबर की रात्रि में 12:00 से 2:00 बजे तक भगवान श्री विष्णु के जागरण का शुभ काल रहेगा।

ये है पूजा विधि और नियम

देवोत्थान एकादशी की पूजा अत्यंत विधि-विधान से की जाती है। भक्तजन प्रातः स्नान कर घर में पवित्रता स्थापित करें। गंगाजल छिड़ककर शुद्धि करने के बाद पीले या केसरिया वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित कर तुलसी दल, फूल, धूप, दीप और मिठाई चढ़ाएं। घर की चौखट या पूजा स्थान पर गेरू से श्रीहरि के चरणों के चिन्ह बनाएं। गन्ना, बेर, सिंघाड़ा, मौसमी फल आदि का भोग लगाएं। दीप जलाकर शंख या घंटी बजाते हुए सामूहिक रूप से गाएं-
उठो देवा, बैठो देवा, सोने के पलंग से जागो देवा। रात्रि में भगवान विष्णु का जागरण कर कथा श्रवण करें और व्रत का संकल्प लें।

तुलसी विवाह का महत्व

देवोत्थान एकादशी के अगले दिन तुलसी विवाह संपन्न किया जाता है। इस दिन तुलसी जी का विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से किया जाता है। यह विवाह प्रतीक है- भक्ति, प्रेम और धर्म के पवित्र संगम का। तुलसी विवाह के साथ ही विवाहोत्सव का काल आरंभ माना जाता है, और इसी दिन से विवाह आदि शुभ कार्य प्रारंभ होते हैं।

पौराणिक कथा

प्रबोधिनी एकादशी के बारे में पौराणिक कथा यह है कि एक धर्मनिष्ठ राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। एक बार राजा ने अपने सेवक को भी यह नियम पालन करने का आदेश दिया, पर सेवक ने छिपकर भोजन कर लिया। परिणामस्वरूप उसे कई कष्टों का सामना करना पड़ा और अंत में उसने अपने पाप का प्रायश्चित कर एकादशी व्रत का पालन किया, जिससे उसे मोक्ष प्राप्त हुआ। यह कथा सिखाती है कि धर्म और व्रत के नियमों का उल्लंघन दुख का कारण बनता है, जबकि पालन जीवन में सुख, शांति और मोक्ष का द्वार खोलता है।

SP_Singh AURGURU Editor