नाच न जाने, आंगन टेढ़ा और खोदा पहाड़, निकली चुहिया: दो कहावतों के जन्म की असली कहानी

‘नाच न जाने, आंगन टेढ़ा’ और ‘खोदा पहाड़, निकली चुहिया’  सिर्फ़ कहावतें नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्म-हंसी और व्यंग्य की अनमोल परंपरा का हिस्सा हैं। पहली कहानी में चंपा देवी झटकनिया अपनी नृत्य की नाकामी का दोष “टेढ़े आंगन” पर डालती है, जबकि दूसरी कहानी में लाला मोहनलाल अपनी खोदाई की ‘महाकाव्यिक’ घोषणा के बाद चुहिया निकालकर हास्य की नई मिसाल पेश करते हैं। दोनों घटनाएं यह सिखाती हैं कि गलती स्वीकार न करना और परिणाम को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना, इंसानी स्वभाव की चिरंतन विडंबना है।

Nov 8, 2025 - 12:58
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नाच न जाने, आंगन टेढ़ा और खोदा पहाड़, निकली चुहिया: दो कहावतों के जन्म की असली कहानी

-बृज खंडेलवाल-

नाच न जाने, आंगन टेढ़ा — एक ऐतिहासिक दुर्घटना की असली कहानी

बहुत पुरानी बात है, जब मोबाइल नहीं, पर मुंह बहुत चलते थे। आगरा में मुगल बादशाह के जागीरदार का एक गांव था टेढ़ी बगिया के पास, जिसका नाम था “ठुमकपुर”। वहां की सबसे नामी ठुमकिया थी- चंपा देवी झटकनिया। नाम ऐसा कि सुनते ही पायल खुद बज उठे, पर असलियत कुछ और थी।

चंपा देवी ने बचपन में सपना देखा था कि एक दिन वो दरबार में नाचेगी, और राजा बोलेगा — “वाह चंपा, तू तो कला की मूरत है!” पर हुआ उल्टा। जब वो पहली बार नाची, तो राजा बोले — “वाह चंपा, तू तो मूर्खता की मूरत है — क्योंकि नाच कम, चिल्लाहट ज़्यादा सुनाई दी!”

अब गांव वालों ने कहा कि “थोड़ा अभ्यास कर लो”, लेकिन चंपा देवी ने जवाब दिया — “अरे नाच तो मैं खूब जानती हूँ, ये तुम्हारा आंगन ही टेढ़ा है! मिट्टी गीली है, फर्श फिसलन वाला है, हवा गलत दिशा से बह रही है, बदबू अलग आ रही है!”

ढोलची की हर बार जब ताल बिगड़ती, चंपा के कदम बहकते या घूंघट कहीं अटक सरक जाता — तो चंपा देवी का जवाब वही होता: “डांस तो मैं करूंगी, पर ये आंगन सीधा कौन करेगा?”

अंत में गांव के पंचों और लोहार ने तंग आकर कहा, “हम आंगन सीधा नहीं करेंगे, कहावत बना देंगे!”

और उसी दिन पैदा हुई — “नाच न जाने, आंगन टेढ़ा!”

कहते हैं तब से लेकर आज तक, जो अपनी गलती मानने से कतराता है — वो ऑटोमेटिकली चंपा देवी का आध्यात्मिक शिष्य होता है।

खोदा पहाड़ निकला चुहिया

बहुत बरस पहले की बात है, जब किसी काम को बड़ा बताने का फैशन चलन में था, और हर कोई अपनी बात में “महाकाव्य” पैदा करने पर तुला था। उत्तर भारत के आगरा शहर के एक छोटे कस्बे, किरावली में रहते थे लाला मोहनलाल — पेशे से व्यापारी, पर दिल से कथाकार। वे हर बात में ड्रामा डालने के लिए मशहूर थे।

एक दिन गांव की चौपाल में उन्होंने घोषणा कर डाली — “भाइयो! आज मैं बगल के जिले भरतपुर में, राजा साहब के कहने पर पहाड़ खोदने जा रहा हूं, सुना है उसके अंदर सोने का बड़ा खजाना है!” गांववाले हक्का-बक्का। कोई बोला: “लाला पागल हो गया है!” तो कोई बोला: “अरे, चमत्कार हो जाएगा!”  जैसे राजा वैसे लाला!!

लाला ने पूरे तामझाम के साथ फावड़ा उठाया, बाजे-गाजे के साथ निकले, और पूरा गांव तमाशा देखने पीछे चला। तीन दिन तक खोदाई चली। लोग आश्चर्य से झांकते रहे — ‘क्या सच में खजाना निकलेगा?’ चौथे दिन जब मिट्टी उड़ती हुई बवंडर सी ऊपर गई, सबकी सांसें थम गईं। 

गर्जन के बीच मिट्टी के ढेर से कुछ हिलता-डुलता निकला... छोटा सा, मूंछों वाला, डर से कांपता जीव — चुहिया! 

गांववाले हंसते-हंसते लोटपोट। किसी ने ताली बजाते हुए कहा, “लाला ने तो पहाड़ खोदा और चुहिया निकाली!” वही वाक्य चारों ओर उड़ गया, पहले गांव में, फिर जिले में, और आखिर में पूरे देश में — और बन गई कहावत।

लाला आज नहीं रहे, पर उनकी खोदाई की महागाथा आज भी मुहावरों की दुनिया में जीवित है, और हर बार जब कोई बड़ी-बड़ी बातें करके छोटा नतीजा देता है, तो हर गांव में आवाज गूंजती है — “खोदा पहाड़, निकली चुहिया!”

SP_Singh AURGURU Editor